गुरु तेग बहादुर जी — जगदीश कौर की कलम से

गुरु तेग बहादुर, मानव धर्म की चादर।
पूरा विश्व करके नमन करता है आदर।।
मानव धर्म रक्षा हेतु किया आत्म बलिदान।
वीर, साहसी,हिम्मती, धैर्य और बलवान।।
दया, सहजता, संत स्वरूप प्रकाशमान।
नैतिक मूल्यों के धनी,सघन विचारवान।।
तेग के धनी और वाणी के सुधीर थे।
मानवता की रक्षा हेतु साहिब बड़े गंभीर थे।।
कर्मवीर ,क्रांतिवीर और दानवीर थे।
सिख, हिंदुओं के गुरु मुसलमानों के पीर थे।।
दो राज्यों में सुलह करा खून बहने से बचाया।
59 शब्द,57 श्लोक देकर गुरु ग्रंथ साहिब सजाया।।
जैजावंती राग में केवल आप ने लिखी वाणी है।
जीवन जीने की राह दिखाती अमृतवाणी है।।
जब जबर ज़ुल्म की मची हाहाकार थी।
करतारपुर की जंग में उठाई आप ने तलवार थी।।
कृपा राम की अगवाई में कश्मीरी पंडितों ने की फरियाद।
जबर ज़ुल्म से करवाएं मेरे सतगुरु हमे आजाद।
न धर्म की आजादी हमें न कर सके हम अधिष्ठान।
न जनेऊ, पहने न टीका न धार्मिक परिधान।।
मेरे दादा ब्रह्मदत्त को गुरु नानक साहिब ने राह दिखाया।
आज फिर कठिन समय में हमें नानक का द्वार नज़र आया।।
मंदिर में घंटा न शंख गुंजायमान होगा।
कोई वेदों का ज्ञाता न सनातन धर्म होगा।।
मेरे सतगुरु बस आप का ही आसरा है।
हम न रहे जग में जिंदा यही जुल्मी चाहता है।।
ईश्वर ने जो बनाया है उसको कोई न मिटा सकेगा।
सभी धर्म रहेंगे जिंदा कोई न झुठला सकेगा।।
जाके औरंगजेब से कहदो तेग बहादुर आयेंगे।
तुम्हारे जुल्म को समेत परिवार मिटाएंगे।।
वार के अपना परिवार मेरा पुत्र धरा से जाएगा।
अपने चार बेटे वार सबका पिता कहलाएगा।
तेग बहादुर से पहले उनके तीन सिख शहीद किए।
पातशाह गुरबाणी पढ़ते अकाल का हुक्म लिए।।
1675 ईस्वी आया वो दिन कयामत का था।
ज़ुल्म के अंत और जुल्मियों के बगावत का था।।
जल्लाद जलालुद्दीन ने गुरु का शीश धड़ से अलग किया।
आसमान से अश्रुओं की धाराओं ने धरा पर सफ़र किया।।
कड़े पहरे में पुत्र बन भाई जैता जी ने शीश उठाया।
आनंदपुर साहिब में गोबिंद सिंह के पास पहुंचाया।।
लखी शाह वणजारे ने अपना कीमती घर जलाकर।
गुरु को श्रद्धांजलि दी धड़ का संस्कार कर ।।
धन्य धन्य है सिख धन्य है उनकी सिखी।
धन्य है वो गुरु जिन्होंने शहादत की इबादत लिखी।
शीश झुका कर नमन वंदन करती जगदीश।
पावन श्रद्धांजलि कबूल करले मेरे सतगुरु ईश।।
जगदीश कौर प्रयागराज




