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कैसा अजब दौर है — सुनीता तिवारी

आज का समय बड़ा ही विचित्र लगता है।
रिश्ते जो कभी अपनापन और स्नेह के धागों से बंधे रहते थे, अब स्वार्थ और सुविधा के तारों में उलझ गए हैं।
इंसान के पास साधन बहुत हैं लेकिन संतोष कहीं खो गया है।
मोबाइल की स्क्रीन पर मुस्कुराहटें बिखरी रहती हैं, मगर चेहरों पर उदासी की परत चढ़ी होती है।
हर कोई आगे बढ़ने की होड़ में है मगर यह होड़ किस ओर ले जा रही है इसका अंदाज़ा किसी को नहीं। दोस्ती अब लाइक और कमेंट तक सिमट गई है, प्यार व्हाट्सएप स्टेटस पर टिककर रह गया है। मानवीय भावनाएँ धीरे-धीरे मशीन की भाषा में बदलती जा रही हैं।सुविधाएँ बढ़ी हैं मगर शांति घट गई है।भीड़ के बीच भी आदमी अकेला महसूस करता है। मानो यह दौर हमें बहुत कुछ देकर भी भीतर से खाली कर रहा हो।
यही तो है आज का अजब दौर,
जहाँ इंसान अपनी ही बनाई दुनिया में कैदी बन गया है।
सुनीता तिवारी




