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आस्था दिखावे से नहीं, सच्ची श्रद्धा से पहचानी जाती है

 

जे.पी. शर्मा

ब्राह्मण समाज का मूल संदेश सदियों से यही रहा है कि धर्म का सार आचरण में है, दिखावे में नहीं। यदि किसी को वास्तव में भगवान में आस्था है तो उसे मंदिर में जाकर आरती में भाग लेना चाहिए, दीप प्रज्वलित करना चाहिए, और अपनी श्रद्धा को कर्म से सिद्ध करना चाहिए। लेकिन आज स्थिति उलटती जा रही है। कई मंदिरों में घंटी और घड़ियाल तक मशीनों से बजाए जा रहे हैं, क्योंकि लोग केवल आस्था की झूठी दुहाई देते हैं, लेकिन स्वयं मंदिर पहुँचने का समय नहीं निकालते। ऐसे बदलाव समाज की उस दिशा को दर्शाते हैं, जहां पूजा में भाव कम और औपचारिकता अधिक होती जा रही है। सोशल मीडिया के दौर में कई लोग ग्रुपों में मंदिरों या मूर्तियों की तस्वीरें डालकर खुद को भक्त बताने का प्रयास करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि डिलीट होने वाली फोटो से आस्था सिद्ध नहीं होती, बल्कि उल्टा यह भगवान का अपमान होता है।आस्था कैमरे और ग्रुपों पर नहीं, दिल और व्यवहार में बसती है। भगवान तक पहुंचने का रास्ता पोस्ट से नहीं, भक्ति और सच्ची उपस्थिति से जाता है।
समय की जरूरत है कि हम अपने धर्म को दिखावे से निकालकर फिर से सच्ची श्रद्धा और अनुशासन की ओर लौटें। यही आस्था का वास्तविक स्वरूप है।

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