नए ज़माने में रिश्तों की पहचान — अनीता सिंघल,

रवि और सिया — कॉलेज के दिनों की सबसे करीबी दोस्ती।
कभी घंटों बातें होती थीं, चाय के हर कप में हँसी घुली रहती थी।
रवि कहता था, “दोस्ती वो रिश्ता है जो वक्त नहीं, दिल माँगता है।”
और सिया मुस्कुरा देती थी — जैसे बातों से ज़्यादा विश्वास से जवाब दे रही हो।
समय बीता। दोनों अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए।
अब बातें फोन पर नहीं, चैट पर होती थीं।
पहले “कैसी हो?” के पीछे चिंता होती थी,
अब बस एक औपचारिकता — “ओके, टेक केयर।”
धीरे-धीरे जवाब देर से आने लगे।
कभी “टाइपिंग…” दिखती रही, पर संदेश नहीं आया।
फिर एक दिन सिया का “last seen” बदल गया — और रवि का इंतज़ार भी।
रवि सोचता रहा, क्या इतना आसान है किसी को भूल जाना?
महीनों बाद दोनों एक शादी में मिले।
चेहरे पर मुस्कान वही थी, पर नज़रें अब अजनबी सी थीं।
कुछ पल की खामोशी के बाद रवि बोला —
“कभी बात करना आसान था, अब मिलने में झिझक क्यों?”
सिया ने हल्की हँसी के साथ कहा,
“अब सब कुछ आसान हो गया है रवि — रिश्ते भी।”
उसकी आवाज़ में न गर्मी थी, न दूरी — बस एक थकान थी।
रवि ने महसूस किया —
तकनीक ने हम सबको जोड़ तो दिया है,
पर किसी से जुड़ना अब दुर्लभ हो गया है।
कभी रिश्ते समझने में वक्त लगता था,
अब टाइमलाइन से सब तय हो जाता है।
रवि को याद आया वो पुराना वक़्त,
जब वे बिना किसी कारण बस मिलने निकल जाते थे।
अब मिलने से पहले “schedule” बनाना पड़ता है।
पहले खामोशियाँ भी बातें करती थीं,
अब बातचीत में भी सन्नाटा रहता है।
रात को रवि ने फोन उठाया —
पुरानी चैट खोली, जहाँ आख़िरी मैसेज लिखा था — “बात करेंगे।”
और वह सोचने लगा —
शायद नए ज़माने में रिश्तों की पहचान अब यही है,
कि जिनसे सबसे ज़्यादा जुड़ाव होता है,
उनसे बात करने का वक़्त सबसे कम होता है।
उसने एक संदेश लिखा —
“तू ठीक है न?”
फिर कुछ पल देखा, और भेज दिया।
शायद रिश्ते अब ऐसे ही निभते हैं —
थोड़े अधूरे, पर फिर भी अपने।
रचित्- अनीता सिंघल, जयपुर (राज.)




