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पापाजी की आखिरी दीवाली — शिखा खुराना

 

हर वर्ष की तरह उस वर्ष दीपावली का उतना उत्साह नहीं था परिवार में। पिछले कई महीनों से मेरे ससुर जी बहुत बीमार चल रहे थे। सभी का सारा समय और ध्यान उनकी देखभाल और चिंता में ही रहता था। दीपावली के कुछ दिन पहले उनके स्वास्थ्य में सुधार आना शुरू हुआ और वो प्रसन्न लग रहे थे और दीपावली को लेकर बहुत उत्साहित भी थे। पापाजी अब भोजन भी स्वाद लेकर खाने लगे थे और हम सबसे दीवाली की तैयारी के बारे में पूछते और अपने सुझाव बताते कि दीपावली पर सबको उपहार में क्या क्या दिया जाएगा। रोशनी के लिए दिये और लाइटें कैसे लगेंगी, और तो और बच्चों को बुलाकर उन्हें पटाखों और मिठाई के लिए बड़ी उत्सुकता से पैसे बांटने लगे। सारा परिवार पापाजी का उत्साह देखकर खुश था।
सबको तसल्ली हुई कि पापाजी बिल्कुल नार्मल थे। टाइम से दवाई और खाने का खुद ही ध्यान रखते। पूरा दिन बच्चों के साथ मस्ती करते। छोटी दीपावली की शाम तो सबको बुलाया और बोले आज मेरी तरफ़ से सबको आइसक्रीम पार्टी दी जाएगी और सबकी पसंद की आइसक्रीम मंगवाकर पार्टी की। देर रात तक अपने बचपन के किस्से बच्चों को सुनाते रहे। आज पापाजी बहुत खुश लग रहे थे। सबको अपने कमरों में जाने को कहा और ज़ोर से गुडनाईट बोलकर सो गए। हमारा कमरा पापाजी के कमरे के साथ ही जुड़ा हुआ था। रात में जब भी कोई उठता पापाजी के कमरे में झांक कर जाता। मैं सुबह करीब तीन बजे उठी और पापाजी के कमरे में देखने गई।
पापाजी जगे हुए थे। उन्होंने इशारे से मुझे बुलाया। पास पहुंची तो मेरे सर पर हाथ रखकर बहुत सा आशीर्वाद देने लगे। मैंने पूछा आप ठीक हो, कोई तकलीफ़ हो रही है क्या। पापाजी ने आश्वासन दिया नहीं इतना सुंदर प्रेम से मिलजुल कर रहने वाला परिवार और संस्कार छोड़कर जा रहा हूं, मुझे कोई तकलीफ़ नहीं है। और मैं आज के पवित्र दिन यहीं सबके साथ दीपावली मनाने आता रहूंगा, कहते हुए मेरा हाथ थामकर प्राण छोड़ दिए।
पापाजी को हम हर दीपावली आइसक्रीम पार्टी करके याद करते हैं और खुश रहने की हर संभव कोशिश करते हैं।
शिखा©®

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