शादी के बाद की पहली दीवाली — सुनीता तिवारी

संस्मरण
शादी के बाद की पहली दीवाली मेरे जीवन की सबसे यादगार शामों में से एक रही।
ससुराल में सब कुछ नया था।
घर, लोग, और रीतियाँ भी। फिर भी उस दिन का उत्साह मेरे मन में कुछ अलग ही उमंग भर रहा था।
सुबह से ही पूरे घर में हलचल थी।
सासू माँ रसोई में मिठाइयाँ बना रही थीं, मैं उनकी मदद करते हुए बार-बार यह सोच रही थी कि अब मैं भी इस घर की लक्ष्मी कहलाती हूँ।
शाम ढली तो श्रृंगार कर नई साड़ी में जब दीप सजाने बैठी, तो मन में एक अजीब सी तृप्ति थी।
आँगन में रखे हर दीपक की लौ जैसे मेरे नए जीवन का प्रतीक बन गई थी।
नया घर, नए रिश्ते और नई जिम्मेदारियाँ।
पति ने मुस्कुराकर कहा—पहली दीवाली है तुम्हारी, रोशनी तुमसे ही फैली है।
उनके शब्द सुनकर मन भी दीप बन गया।
पूरे परिवार ने मिलकर लक्ष्मी-गणेश की पूजा की, फिर मिठाइयाँ बाँटीं और हँसी-खुशी से भरा वह घर मुझे अपनापन दे गया।
उस रात जब सब दीप टिमटिमाते रहे, तो लगा यह सिर्फ घर की नहीं, मेरे मन की भी पहली सच्ची रोशनी थी।
सुनीता तिवारी



