स्वाभिमान — माया शर्मा

आशुतोष अपने माँ -बाप का इकलोता बेटा था। बहुत मन्नतों के बाद उसकी माँ की गोद में वो आया था। ना जाने कितनी चौखटें चूमी होगी तब कहीं आशुतोष की किलकारी उनके घर आंगन में गूंजी थी। बहुत धूमधाम
से उसके होने पर उत्सव मनाया गया। पूरे गाँव को न्यौता दिया था आशुतोष
के दादा ने आखिर सरपंच जो थे गाँव के। वक़्त निकलता गया आशुतोष अब जवान हो चुका था। मुंबई में
पढ़ने गया था तो वहीं एक सुंदर सी लड़की से उसने शादी भी कर ली।
अचानक एक दिन अपनी मोर्डन बीवी को लेकर वो गाँव आता है। उसकी बीवी गाँव में आना ही नहीं चाहती थी मगर आशुतोष ने जोर दिया तो उसको आना ही पड़ा। बे-ढन्गे कपड़े पहने आई बहू को देख उसके दादा ( सरपंच) जी आग -बबुला हो उठे। काफी समझाईश के बाद मामला शांत हो पाया। थोड़े दिन बाद ही आशुतोष के दादा जी का स्वर्ग वास हो गया तो अपने माँ बाबा को उसे अपने साथ शहर ले जाना पड़ा।
वहाँ उसके माँ बाबा को उसकी पत्नि ने कभी सम्मान नहीं दिया । आशुतोष के सामने उसकी पत्नि
उसके माँ बाबा से बहुत अच्छा व्यवहार करती थी मगर जैसे ही आशुतोष घर से बाहर जाता उसकी पत्नि उनसे नौकरों से भी बदत्तर सुलूक किया करती थी। आशुतोष की माँ दिन भर घर की साफ- सफाई करती और खाना भी बनाती जबकि आशुतोष के बाबा बच्चों को स्कूल लेजाने लाने का काम करते और साग सब्जि भी वे ही लेकर आते। थककर चूर होने पर उनको ठण्डा पानी तक नहीं मिलता था। एक दिन परेशान होकर दोनों गाँव लौट जाते हैं। बेटे
आशुतोष को जब पता चलता है तो वो अपनी पत्नि के साथ उनको मनाने के लिए गाँव जाता है तब उसके माँ बाबा उसको उसकी पत्नि द्वारा किये गए दुर्व्यवहार के बारे में खुल कर बताते हैं और बहुत आग्रह करने पर भी उनके साथ शहर नहीं जाते। सच में अपमान की चुपड़ी रोटी से मान और सुकून के दो निवाले अच्छे होते हैं।
माया शर्मा/लेखिका


