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यादगार दीपावली — अलका गर्ग, गुरुग्राम

 

हर दिवाली ही अपनी कोई खट्टी मीठी याद ज़रूर छोड़ जाती है।कुछ संस्मरण सदा के लिए हमारे मानस पटल पर अंकित हो जाते हैं।
हमारी दूसरे शहर में नौकरी होने के करण अपने घर एक डेढ़ साल बाद जाने का अवसर मिलता था।हम दिवाली पर ही घर जाने की कोशिश करते ।घर बंद रहने के कारण बहुत गंदा हो जाता था तो दीपावली पर उसकी सफ़ाई भी हो जाती थी और घर में दिये भी जल जाते थे।
एक बार छुट्टी ना मिल पाने के कारण दीपावली से दो दिन पहले ही घर जाने के लिए निकल सके।त्यौहारों के दिन होने के कारण समय पर प्लेन में टिकिट भी नहीं मिलीं तो ट्रेन से ही जाने का निर्णय लिया।मन बहुत ख़राब था कि इतनी देर से पहुँच कर क्या क्या कर पायेंगे..सफ़ाई पूजा की तैयारी ख़रीदारी कैसे करेंगे।
हमारी परेशानी और भी बढ़ गई जब किसी मालगाड़ी के पटरी से उतर जाने पर ट्रेन बारह घंटे लेट हो गई ।और भी बहुत सी ट्रेन रुकी होने के कारण सभी को रास्ता देने के लिए जगह जगह रोक दे रहे थे।अब तो लगने लगा था कि यह दिवाली ट्रेन में ही बीतेगी।
मोबाइल का जमाना नहीं था।घर वाले भी सिर्फ़ समाचारों के ज़रिए ही हमारी गतिविधि समझ पा रहे थे।और हमारे पास तो अपनी खबर उन तक पहुँचाने का कोई ज़रिया ही नहीं था।
आख़िर दीपावली की रात को सात बजे ट्रेन पहुँची।बड़े दुखी मन से इतने बड़े त्यौहार के दिन अंधेरे और गंदे घर की कल्पना करते हुए जा रहे थे।परंतु सुखद आश्चर्य ..देखा घर बाहर रंगोली बनी है ,फूल और बंदनवार सजे हैं दिये जल रहे हैं।किसने किया यह सब …?
सोचते हुए समान उतार रहे थे तभी नये पड़ोसी ने आ कर हमारा स्वागत किया और बोले सोसाइटी के ऑफिस से मालूम हुआ कि आप लोग कल आने वाले हैं।फिर टीवी में देखा तो मालूम हुआ कि अवरोध के कारण बहुत ट्रेन रुकी हुई हैं तो समझ गये कि आपको आने में देर होगी इसलिए बाहर कि सफ़ाई करके दिये जला दिये।इतनी रात में आप बाज़ार कैसे जायेंगे तो दूध
ब्रेड ,मक्खन ,नाश्ता,थोड़ा फल,
मिठाई अपने साथ साथ आपके लिए भी ले लिया।रात हमारे साथ ख़ाना खा कर थोड़ा ज़रूरी सफ़ाई करके आप आराम कीजिए कल से सब शुरू करियेगा।
हम दोनों पति पत्नी निःशब्द थे।ऐसे सहृदय पड़ोसी पा कर स्वयं को धन्य मान रहे थे।आज भी हमारे उनसे बहुत अच्छे संबंध है ।हम चाहे देश विदेश कहीं भी रहें पर हरेक दिवाली में उन लोगों की याद आ ही जाती है।

अलका गर्ग, गुरुग्राम

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