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अमरनाथ यात्रा– सुनीता तिवारी

संस्मरण

सालों से इच्छा थी कि अमरनाथ बाबा के दर्शन करूँ, पर हर बार कोई न कोई कारण आड़े आ जाता।
आखिर वह शुभ दिन आया जब मुझे यात्रा का अवसर मिला। जुलाई का महीना था, पर पहाड़ों में मानो जनवरी की ठंड उतर आई थी।
पहाड़ों की बर्फीली हवा शरीर को कंपा देती थी, मगर भीतर श्रद्धा की ज्योति जल रही थी।
सुबह-सुबह जब हम श्रीनगर पहुंचे तो चारों ओर केवल सफ़ेद बर्फ़ और नीले आसमान का अनंत फैलाव था।
हर यात्री के होंठों पर हाय ठंड की पुकार थी।
कभी बर्फीले पानी की बूंदें चेहरे को छू जातीं, तो कभी हवा का तेज़ झोंका माथे का पसीना जमा देता।
हम लोगों ने बालटाल के लिए टैक्सी बुक कर ली थी,सारा रास्ता नदी के किनारे- किनारे था।
दो घंटे बाद हेली कॉप्टर के लिए निर्धारित स्थान पर पहुंच गए।
रास्ते में कई वृद्ध यात्री भी डंडा टेकते हुए आगे बढ़ रहे थे जिन्हें देखकर हमें इन पर नाज़ हो रहा था।
उनके दृढ़ संकल्प को देखकर मन में नया जोश भर जाता।
जब अंततः गुफा के पास पहुंचे तब कुछ सीढियां चढ़ना थी जो कि बर्फ की तरह ठंडी थीं,जैसे तैसे कपकपाते हुए भीतर पहुँचे, तो सामने हिमलिंग के दर्शन हुए।
पलभर के लिए लगा जैसे सारी थकान, सारा दर्द, सबकुछ उसी क्षण समाप्त हो गया। आँखों से आँसू बह निकले, और मन में बस यही शिवभाव था,
“सचमुच, यह केवल यात्रा नहीं, एक आत्मिक अनुभव है।”
वापसी के समय बर्फबारी शुरू हो चुकी थी। ठंडी हवाएँ चेहरे को चीर रही थीं, पर मन में एक अद्भुत शांति थी।
लगा,भगवान शिव ने स्वयं आशीर्वाद दिया हो
कि जीवन की हर कठिनाई में श्रद्धा की यह ऊष्मा हमें सदा ऊर्जावान रखे।

सुनीता तिवारी

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