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बस २ मिनट, (संस्मरण) — अलका गर्ग, गुरुग्राम

 

एक दिन आलू का पराँठा खाने का मन किया। कुकर ख़राब हो गया था तो देकची में चार छोटे आलू गैस पर उबालने के लिए रखे।सोचा समय क्यूँ बर्बाद करूँ तब तक बालकनी में बैठ कर ‘काव्यस्थली’ के लिए कविता ही लिख लेती हूँ वरना प्रतियोगिता का समय समाप्त हो जाएगा तो शामिल नहीं हो सकेगी।छह सात पंक्तियाँ लिखने तक दो बार देख भी आई थी पर नहीं उबले थे।तो मनोयोग से लिखने लगी।
तभी पड़ोस की बालकनी में अपने पौधों को पानी देने आई पड़ोसन ने सुप्रभात कहा और बात करने लगी। और क्या हो रहा है …??लगता है आज तो सुबह सुबह ही लिखने बैठ गईं ।
मैंने सोचा उससे बस दो मिनट बात करके फिर आलू चेक करूँगी पर ….वो दो मिनट आधे घंटे बाद हुए जब कुछ जलने की गंध आने लगी।हम दोनों हँस कर बोले कि लगता है किसी के घर कुछ जल रहा है।अचानक मैं अंदर भागी तो देखी पानी जल कर देकची तो काली हो चुकी है पर आलू सही सलामत रखे हुए हैं।देख कर बहुत ख़ुशी हुई परन्तु जैसे ही आलू को उठाया तो वे पिचक गये।वे केवल आलू का खोल मात्र थे।अंदर का गूदा पूरा जल चुका था और साथ ही आलू पराँठा खाने का सपना भी…
उधर पड़ोसन का दूध भी उबल उबल कर बिना मेहनत किए हुए ही रबड़ी बन चुका था।
बचपन में मेरे बातूनीपन के कारण नानीजी की कही बात याद आ गई कि …चट्टो खोवे एक घर और बत्तो खोवे दो घर …मतलब चटोरा इंसान सिर्फ़ अपने ही पैसे और काम का नुक़सान करता है पर बातूनी इंसान अपने साथ साथ दूसरे का भी नुक़सान करता है।
आज मैंने अपनी नानीजी को शत प्रतिशत सही ठहरा दिया था।

अलका गर्ग, गुरुग्राम

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