देवउठनी एकादशी — कविता साव पश्चिम बंगाल

देवउठनी एकादशी जिसे प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीनों की योगनिद्रा (चातुर्मास) से जागते हैं। भगवान के उठने के साथ ही शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ, संस्कार आदि पुनः प्रारम्भ होते हैं।
यह दिन धर्म, दान, व्रत एवं तुलसी-शालिग्राम विवाह के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। देवउठनी एकादशी पर तुलसी के पौधे के समीप दीप प्रज्ज्वलन, भगवान विष्णु का पूजन एवं परिक्रमा का विशेष महत्व है।
पौराणिक कथा
एक बार लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु से कहा,
“प्रभु! बिना विश्राम किए संसार के पालन-पोषण में लगे रहने से आपके शरीर को थकावट आती होगी। कृपया कुछ विश्राम करें।”
भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले,
“देवि! तुमने सत्य कहा। संसार के हितार्थ मैं प्रत्येक वर्ष चार मासों तक योगनिद्रा में जाऊँगा।”
इसके बाद भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर शयन करने लगे। इन चार महीनों को चातुर्मास कहा गया। इन दिनों में शुभ कार्य वर्जित माने गए।
चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु का उठना होता है। इसी दिन देवताओं, ऋषियों और भक्तों ने भगवान का अभिषेक कर उनका स्वागत किया। सभी ने प्रसन्न होकर कहा,
“हे नाथ! आपके उठने से संसार शुभ कर्मों के मार्ग पर पुनः अग्रसर होगा।”
भगवान विष्णु ने कहा,
“जो भक्त इस एकादशी का व्रत रखकर मेरा पूजन करेगा, उसके सभी पाप नष्ट होंगे, तथा उसे मोक्ष और विष्णुलोक की प्राप्ति होगी।”
तुलसी-विष्णु विवाह कथा_
प्रचलित कथा के अनुसार तुलसी जी (वृंदा) भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। संसार के कल्याण और धर्म की स्थापना हेतु भगवान ने असुर जलंधर का अंत करने का संकल्प लिया। जलंधर की पत्नी वृंदा की अटूट निष्ठा के कारण उसे परास्त नहीं किया जा रहा था।
भगवान विष्णु ने ब्राह्मण रूप में वृंदा की तपस्या भंग की, जिसके फलस्वरूप जलंधर का वध हुआ। वृंदा क्रोधित होकर बोली
“हे विष्णु! आपने मेरे पतिव्रत का अपमान किया, आप भी पत्थर बनेंगे।”
वृंदा का श्राप सत्य हुआ और विष्णु शालिग्राम रूप में प्रकट हुए। भगवान ने कहा,
“देवि, तुम तुलसी के रूप में पूजित होकर मुझसे विवाह का सौभाग्य पाओगी।”
इसीलिए देवउठनी एकादशी पर तुलसी-शालिग्राम विवाह किया जाता है।
महत्व,
भगवान विष्णु के जागरण का दिन
शुभ कार्यों का प्रारंभ
पितरों और देवों को प्रसन्न करने का समय
व्रत, दान, दीपदान, तुलसी पूजा से पुण्य की प्राप्ति
विशेष मान्यता
इस दिन घर के आँगन में गोबर या मिट्टी से भगवान विष्णु का प्रतीक बनाकर, दीप जलाकर कहा जाता है,
“उठो देव, बैठो देव, अंगुरी पखारो देव, नया जागरण, नया सृजन, मंगल बरसो देव।”
कविता साव
पश्चिम बंगाल




