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कर्म में नेकी और ईमानदारी — प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या

 

कर्म मनुष्य के जीवन का आधार है। जन्म के क्षण से लेकर अंतिम श्वास तक, हम जो भी करते हैं वही हमारे व्यक्तित्व और मूल्य का निर्धारण करता है। परंतु केवल कर्म करना ही पर्याप्त नहीं होता; उसके पीछे की नीयत, उसका भाव और उसकी पवित्रता ही उस कर्म को सार्थक बनाती है। जब कर्म में नेकी और ईमानदारी हो, तब साधारण से साधारण कार्य भी असाधारण महत्व प्राप्त कर लेता है।

नेकी का अर्थ केवल दूसरों के लिए अच्छा करना नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के प्रति भी सच्चा होना है। एक नेक कार्य वह है जो किसी को सुख पहुँचाए, किसी का दुख कम करे और समाज में सद्भाव का संचार करे। नेकी का बीज बोया जाए तो वह न केवल दूसरों के दिल में अंकुरित होता है, बल्कि करने वाले के मन में भी शांति और संतोष का वृक्ष बन जाता है।

ईमानदारी जीवन की रीढ़ है। यह वह गुण है जो बिना बोले भी व्यक्ति को विश्वसनीय बना देता है। ईमानदार व्यक्ति अपने कर्मों के माध्यम से दूसरों के सामने एक ऐसा आईना रखता है जिसमें साफ दिखता है कि सत्य और नैतिकता आज भी उतने ही मूल्यवान हैं जितने कभी थे। ईमानदारी केवल बाहरी आचरण नहीं, यह भीतर की दृढ़ता है—यह संकल्प कि किसी भी परिस्थिति में सत्य और न्याय का मार्ग नहीं छोड़ना।

जब नेकी और ईमानदारी दोनों हमारे कर्मों में समाहित हो जाते हैं, तब कर्म पूजा बन जाते हैं। ऐसे कर्म न केवल व्यक्ति का उत्थान करते हैं, बल्कि समाज को भी मजबूत बनाते हैं। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने इन मूल्यों को अपनाया, वे चाहे कितने ही कठिन दौर से गुज़रे हों, पर अंत में सम्मान, प्रेम और आदर के पात्र बने।

आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में जहाँ स्वार्थ की धुंध अक्सर दृष्टि पर छा जाती है, वहाँ नेकी और ईमानदारी सूर्य की किरणों की तरह हैं,जो अंधकार भेदकर रास्ता दिखाती हैं। यही कारण है कि हर कदम पर यह विचार करना ज़रूरी है कि हमारा कर्म न केवल हमारे हित में हो बल्कि समाज, परिवार और मानवता के हित में भी हो।

अंततः, मनुष्य अपने कर्मों से पहचाना जाता है। यदि उन कर्मों में नेकी की सुगंध और ईमानदारी की चमक हो, तो जीवन स्वयं एक संदेश बन जाता है।

प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या

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