संस्मरण लेख : बचपन की सुनहरी यादें — पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’

जीवन की तीन अवस्थाएं हैं। बचपन जवानी और बुढ़ापा इन तीनो में से खूबसूरत होता है बचपन और उनकी सुनहरी यादें।जीवन का सुंदर समय होता है बचपन।बचपन के दिन अनमोल होते हैं। बचपन एक निर्मल कोमल भोलेपन सा होता है।बालक अपनी मोज मस्ती में खोयें रहता है। अपनी मन मर्जी से खिलता कूदता है। न कोई चिंता, ना कोई डर,न पढ़ने की चिंता।बापूजी के साथ खेत में जाना। दोस्तों के साथ घूमना। दोस्तों के साथ खेल खेलना।कभी कभी बिन बात हंसता रोता भी रहता है। किसी से ना कोई ईर्ष्या,द्वैष,भेदभाव ऐसा होता है बचपन। एक निर्मल कोमल भोलेपन सा होता है। एक छोड़ की तरह बालक होता है।जीस सांचे में ढालना चाहे वह इस सांचे में ढल जाता है। बचपन में बालक बहुत कुछ सीखता रहता है। मा ही उसकी प्रथम पाठशाला है। बाल्यावस्था में मा से वह बहुत कुछ सीखा पाता है। सहज भाव से मां उसे सिखाती है।मां बाप का भी फर्ज होता है बालक को बचपन से ही अच्छे संस्कारों के साथ जीवन के लक्ष्य निर्धारित करने की सीख देनी चाहिए।अपने घर परिवार मित्र पड़ोसी से वो सिखते हैं। इस का बालक के कोमल मन पर सबसे चिरस्थाई प्रभाव पड़ता है।बालक को अच्छी संगत की भी जरूरत होती है।बचपन से ही बालक प्रेम स्नेह ,परिश्रम करना, सेवा भावना आज्ञा पालन जैसे गुण अनायास सीख जाता है। यह सब गुणोंका विकास युवावस्था में होता है।बालक अनुकरण करता है।इसलिए उनके सामने हमें अच्छा आचरण, व्यवहार करने की भी आवश्यकता है।हम जैसा करेंगे बालक वैसा करेंगे।हमारा अच्छा बुरा व्यवहार का असर भी बालक के मन मस्तिष्क पर पड़ता है।इसका सहज स्वभाव है।लड़ाई झगड़ा बुरी आदतों का बुरा प्रभाव उनके मन मस्तिक पर पड़ता है जो हटता नहीं है। बालक को इससे दूर रखना जरूरी है।बचपन जीवन की सुनहरी नींव का समय है।जितनी अच्छी नींव होगी उतना सुंदर भविष्य होगा।
श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर-गुजरात)




