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यह एक मजाक था  — डॉ संजीदा खानम शाहीन 

लघु कथा

यह एक मजाक है लेकिन में सच कह रहीं हूं।आज के दौर में लोग मतलबी हो गए ।सिर्फ मतलब साधने में लगे है। किसी को भी किसी की आज के युग में परवाह नहीं है। लोग अगर काम हो तो ही बात करते है ।बिना मतलब के किसी को किसी की नहीं पड़ी । किसी की दुख तकलीफ का कोई अंदाजा नहीं किसी को भी,
बस एक दूसरे से जलन हसद वाला दौर है । हर दूसरा व्यक्ति किसी की कामयाबी से दुखी है ।
अपनी खुशी से खुश रहने से ज्यादा दूसरे को दुख में देखते ही खुश होना ज्यादा अच्छा मानते है।
दुख में हो तो भी किसी की मदद नहीं करते ।स्वार्थी परिवेश में ,स्वार्थी हो गए है ।बस खुद की सोचना ,अच्छा करना खुद का करना।
विचार ,सोच का पैमाना जैसे कि बिल्कुल खाली है सद्भावना से मानवता से। भेदभाव बाह्यडंबर ही मानो ,जैसे इनके काम हो ।
रानी एक बार दोस्तों के साथ बैठी थी
दोस्तो को बोली
कहा? घर की छत पर मोर नाच रहा ।हाथी झुंड में चल रहे, शेर दहाड़ते मैने देखा ।
सभी ने हंसी उड़ाई रानी की बोले और कोई मजाक नहीं था क्या, करने के लिए ।
रानी हंसी और बोली एक काल्पनिक सीरियल टीवी पर ये सब देखा।
सब सोच में पढ़ गए ।मजाक तो है पर सच है ।

मौलिक अप्रकाशित स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन

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