अपनापन — सीमा शुक्ला चांद की कलम से

लघुकथ
गोपाल ने शीला से कहा सुनो बच्चों की बड़ी याद आती है । आजकल तो फोन भी नहीं आता. शीला गोपाल से आप तो सच में सठिया गए हो बाबू रोज ९ बजे अपने कार्यालय चला जाता है रेखा बहू भी दिनभर अपने कामों में व्यस्त रहती है। सब हमारी तरह बेकार तो नहीं बैठे और ज्यादा याद आ रही है तो आप ही फोन मिला लो जयपुर है ही कितना दूर रूको आज मैं बाबू से बात करती हूं। अबकी बार वो आएगा तो हम भी उनके साथ जयपुर चल देंगे गुड़िया और नन्हें के साथ कुछ दिन रह लेंगे ।
गोपाल अरे नहीं भाग्यवान मैं कहीं भी नहीं जाऊंगा। दूर रहने पर भ्रम तो बना रहता है की बच्चे हमारी फ़िक्र करते हैं। ईश्वर की कृपा हैं हम बच्चों पर आश्रित नहीं है ना तो ना जाने क्या क्या और देखना पड़ता।
शीला अजी आप भी कैसी बात कर रहे हो बच्चे अपने ही है वो हमसे अपेक्षा ना करें तो भला और किससे करें। भाग्यवान अपेक्षा से कौन डरता है मुझे तो उपेक्षा से डर लगता है। याद है पिछली बार हम जब दो माह के लिए जयपुर गए थे तुम खून के आसूं रोई थी मैं बोलता नहीं तो क्या समझता भी नहीं। अरे आप तो कुछ भी समझते हो
नहीं शीला हमारे इस घर में नौकर चाकर सभी हैं अब तुम्हें काम की आदत नहीं है आंखों में बराबर दिखता भी नहीं है ये सब जानते हुए बहू का हर काम तुम पर डालना मुझे बहुत कष्ट देता है। नहीं शीला तुम कुछ भी कहो मैं कहीं नहीं जाऊंगा। चलो तुम ही बताओ तुम्हारी बहू ने तुम्हें कितने दिन परोस कर एक थाली भोजन कराया। कितनी बार तुमसे पूंछा मां मैं सोसायटी में घूमने जा रहीं हूं आप चलोगी। कितनी बार तुमसे हंसकर बिना मुंह फुलाए बात की। मैं जानता हूं तुम्हारे पास मेरे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं हैं।इसलिए कह रहा हूं अपनी इज्जत अपने हाथ।
सुनो जी वो बच्चे हैं उनकी बातों को क्यों मन से लगाते हो। गुस्सा थूक दो आखिर वो तो अपने ही बच्चे हैं। इस बुढ़ापे में वो ही तो अपनापन दे सकते हैं कोई बाहर वाला तो अपनापन नहीं दे पाएगा। गोपाल गुस्से में देखो शीला मुझे ऐसे अपनेपन की अब कोई आवश्यकता नहीं है। हां रक्त से जुड़े हैं तो कभी कभी मन व्याकुल हो जाता है। हमारे लिए तो हम दोनों का ही अपनापन सबसे ज्यादा ठीक है ।
दोनों हंसने लगते हैं
सीमा शुक्ला चांद




