भूली बिसरी यादें– सुनीता तिवारी

गद्य/संस्मरण
साल के आख़िरी पन्ने पलटते समय स्मृतियाँ अपने-आप दस्तक देने लगती हैं।
कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें समय की धूल ने ढँक दिया था, पर जाते साल के साथ वे फिर उभर आती हैं बिलकुल पुराने एलबम की तस्वीरों की तरह।
कहीं मुस्कान है कहीं नमी, कहीं सीख तो कहीं आत्मबल।
इस साल ने हमें ठहरना सिखाया।
भागती दिनचर्या में रिश्तों की अहमियत समझाई।
किसी अपने का बिना कारण किया गया फ़ोन, किसी बुज़ुर्ग का आशीर्वाद, बच्चों की निश्छल हँसी ये सब छोटी बातें थीं, पर भीतर गहरा असर छोड़ गईं।
कुछ सपने पूरे हुए, कुछ अधूरे रह गए पर अधूरे सपनों ने ही आगे बढ़ने की जिद दी।
कठिनाइयाँ भी कम न थीं।
कई बार लगा कि रास्ता यहीं थम जाएगा, पर हर अँधेरे के बाद उम्मीद की कोई किरण ज़रूर मिली।
असफलताओं ने हारना नहीं, संभलना सिखाया।
समय ने बताया कि हर ठोकर अनुभव बनकर जीवन को समृद्ध करती है।
अब जब यह साल विदा हो रहा है, तो शिकायतें कम और कृतज्ञता अधिक है।
जो मिला, उसके लिए आभार जो छूटा, उसके लिए स्वीकार।
जाते साल की ये भूली-बिसरी यादें मन में एक सौम्य विश्वास छोड़ जाती हैं कि आने वाला समय और बेहतर होगा, क्योंकि हमने जीना सीख लिया।
सुनीता तिवारी




