धीरे-धीरे-रे-मना, सब कुछ धीरे होय।माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय।– अमृत बिसारिया दुबई

शहर के बीचोंबीच बने एक छोटे से किचन-गार्डन में आरव रोज़ पौधों को निरखता था, जल्दी-जल्दी पौधों को पानी देता। वह चाहता था कि उसकी लगाई मिर्च और टमाटर की बेलें जल्द से जल्द फल दें। एक दिन वह अधीर होकर बोला,
“यार, कब तक इंतज़ार करूँ? रोज़ पानी देता हूँ, पर फल तो आते ही नहीं!”
वहीं पर खड़ी अपार्टमेंट की बुज़ुर्ग पड़ोसी, संध्या अम्मा, मुस्कुराते हुए आ गईं। उनके हाथ में झरझराती सूखी तुलसी की पत्तियाँ थीं।
उन्होंने कहा, “बेटा आरव, पौधे बड़े होते समय जल्दबाज़ी नहीं समझते। उन्हें समय चाहिए।”
आरव ने गुस्से में भौंहें चढ़ाकर कहा, “लेकिन अम्मा, मैं रोज़ बहुत सारा पानी देता हूँ। जितना ज्यादा दूँगा, उतना जल्दी उगेंगे न?”
अम्मा ने मुस्कुराते हुए कहा “नहीं बेटा। ‘धीरे धीरे रे मना, सब कुछ धीरे होय; माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय’—इसका मतलब है कि समय आने पर ही फल मिलता है। चाहे सौ घड़े पानी डाल दो, पर मौसम और धैर्य दोनों जरूरी हैं।”
आरव ने पौधों की तरफ देखा, वहाँ की मिट्टी इतनी भीगी थी कि कीचड़ बनने लगा था।
अम्मा ने आगे कहा, “देखो, ज़्यादा पानी से जड़ें सड़ भी सकती हैं। ज़्यादा पानी देने से कोई फ़ायदा नहीं होता है। जीवन में भी यही होता है—मेहनत करो, पर फल की जल्दबाज़ी न करो। हर चीज़ अपनी गति से आगे बढ़ती है और खिलती है।”
आरव की आँखों समझदारी से चमक उठी और उसे अम्मा की बातें समझ आ गई।“तो मुझे इनको समय देना चाहिए? जैसे पढ़ाई में धीरे-धीरे आगे बढ़ता हूँ?”
“हाँ, बिल्कुल। समय सबसे अच्छा शिक्षक है,” अम्मा बोलीं।
कुछ हफ्तों बाद, एक सुबह छोटे-छोटे हरे टमाटर लटके दिखे।
आरव खुशी से चहक उठा-
“अम्मा! आपकी बात सच थी। फल खुद समय पर आ गए!”
अम्मा मुस्कुराईं,
“बस बेटा, जीवन हो या पौधे—धैर्य ही सबसे मीठा फल देता है।”
अमृत बिसारिया
दुबई




