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काम वाली बाई — सुनीता तिवारी कहानी

 

सुबह के पाँच बजते ही लीला अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करती, बालों में जल्दी-जल्दी कंघी फिराती और बड़ा-सा झोला उठाकर घरों की ओर निकल जाती।

मोहल्ले में सभी लोग उसे “ लीला बाई” के नाम से जानते थे।
चेहरे पर थकान होते हुए भी वह हर दरवाज़े पर मुस्कान लेकर पहुँचती
चलो बहन जी, काम शुरू करूँ?

लीला बाई का जीवन आसान नहीं था।
पति वर्षों पहले बीमारी में गुजर गया था, दो छोटे बच्चे और बूढ़ी सास का भार उसके कंधों पर था।

सुबह से शाम तक पाँच-पाँच घरों में काम करके ही घर का चूल्हा जलता था।
पर उसके मन में शिकायत का एक शब्द न था।

एक दिन जब वह शर्मा जी के घर पहुँची, तो बहू ने कहा
लीला बाई, आज थोड़ा जल्दी आ जातीं तो अच्छा होता, मेहमान आने वाले हैं।

लीलाबाई ने मुस्कुराकर कहा
“बहनजी, बिटिया को बुखार था, उसे दवा दिलानी थी, इसलिए देर हो गई। अब काम जल्दी निपटा दूँगी।”

वह तेज़ी से झाड़ू-पोंछा करती रही, पर उसकी आँखों का धुंधलापन छिपा नहीं था। बहू ने पहली बार गौर से देखा
लीला बाई की आँखें लाल थीं, शायद रात भर जागने से।

“सब ठीक है न?” बहू ने पूछा।

लीला का स्वर धीमा हो गया
“हाँ बहनजी… बस बिटिया की तबीयत से थोड़ा मन घबराया हुआ है।
डॉक्टर ने कहा है कि खून की कमी है, कुछ इंजेक्शन लगेंगे।”

बहू ने पर्स से कुछ पैसे निकालकर उसके हाथ में रख दिए
“यह ले लो… बिटिया के इलाज के लिए। महीने की तनख्वाह से मत कटवाना।”

लीला की आँखों में आँसू भर आए।
“बहनजी… आप बहुत दयालु हो। मैं कैसे…?”

“अरे, आपकी बेटियाँ भी तो हमारी हैं।
आप पूरे दिल से हमारा घर संभालती हैं यह हमारा फर्ज़ है।”

उस दिन लीला बाई घर लौटी तो दिल हल्का था।
थकान अब भी थी, पर भीतर एक नई ताकत जाग रही थी
दयालुता हमेशा किसी न किसी मोड़ पर मिल ही जाती है।
वह मन ही मन बोली
“गरीबी बड़ी हो सकती है, पर इंसानियत उससे हमेशा बड़ी होती है।

सुनीता तिवारी

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