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राजस्वला‌ स्त्री व्यवहार — सीमा शुक्ला चांद

वैसे तो पुरातन काल से महिला, स्त्री या नारी के व्यवहार को अत्याधिक गुप्त वा गहरा माना गया है। कई जगह आम भाषा मे महिला मन को समुद्र माना गया है जिसमें उसकी क्षमताओं का उसके व्यवहारों के मोती छुपे रहते है। सामान्य दिनों में जब‌ महिलाओ के व्यवहार को समझना लगभग नामुमकिन है तो जब वही महिला मासिक धर्म से होती हैं तो उनका व्यवहार उनकी स्वंय की समझ से‌ परे होता‌ है तथा उस व्यवहार को समझना‌ और भी कठिन हो जाता है।
दरअसल यदि राजस्वला ‌स्त्री की परिस्थितियों को उसके शारीरिक परिवर्तन को वह और गृह के सभी लोग समझ लें तो उसके व्यवहारों को समझना अत्याधिक सरल हो सकता है।
जिस पल स्त्री को मासिक धर्म शुरू होता है उसके पूर्व से ही उसके गुप्तांगो में अचानक दर्द खिचाव‌ जो कभी तीव्र‌ कभी धीमी गति से होना प्रारम्भ हो जाता है। प्रत्येक महिला अपने स्वभाव से अत्याधिक सहनशील व संवेदनशील होती‌ है। वह अपनी असीम पीड़ा को छुपाने का सर्वोत्तम प्रयास करती है। परन्तु उस वक्त यदि उसके गृह‌ सदस्य उसके इस प्रयास में सहयोग करें तो वह इस दर्द वाले समय को भी बिना शिकायत के हंसकर गुजार देती है।
मासिक धर्म के दौरान निरंतर पांच‌ से साथ दिनों तक जो रक्त स्त्राव योनी मार्ग‌ से‌ होता है वो ना केवल पीड़ादायक होता है अपितु सृष्टि के सृजनकर्ता को इन दिनों समूह से प्रथक रहकर एकाकीपन भी कठोर कष्ट देता है। मासिक धर्म के इन दिनों में यदि स्त्री को समूह में परिवार में एक सामान्य जीवन जीने दिया जाए तो वह अपने दर्द के ऊपर फिर परिवार की मुस्कान चुनेगी। इसलिए यह आवश्यक है की मासिक धर्म के इन दिनों को माह के सामन्य दिनों जैसा ही रहने दिया जाए।
महिलाओं में इन दिनों जो चिड़चिड़ापन क्रोध तथा एकाकीपन के भाव दिखते हैं वो उनके शारिरीक पीड़ा के साथ साथ उनकी मानसिक पीड़ा को भी दिखाने का तरीका है।
भारत की पितृसत्तात्मक परिवारो में महिलाएं अक्सर अपने आपको, अपने अस्तित्व को हासिये में खड़ा पाती हैं। वे अन्नपूर्णा होकर भी अपने मनपसंद का भोजन भी अक्सर नहीं कर पाती। भोजन जो हर जीव की प्राथमिक आवश्यकता है जब वह उस भोजन के लिए तक अपनो से विद्रोह नहीं कर पाती। तब वह अपने शारीरिक मानसिक कष्टो की व्याख्या क्या ही कर पाएंगी। इसलिए महिने के वे दिन जिनमें उनके व्यवहार का परिवर्तन सार्वभौमिक रूप से सभी को ज्ञात है उन्हीं दिनों में वो अपनी सभी तरह की पीड़ाओं को मासिक धर्म के व्यवहार के रूप में प्रकट करती है।
अतः यदि हम सभी प्रत्येक महिला को अपने अपने स्तर पर सहयोग करें उसके मनोभावों को समझें तो यह बड़ी बात नहीं है की पृथ्वी की यह सृजनकर्ता अपनी परीपूर्ण शक्ति से अपनी शारीरिक मानसिक स्थितियों को आसानी से संबंध पाए।
सीमा शुक्ला चांद

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