प्रहरी मंच की राजस्थान इकाई की काव्य गोष्ठी सम्पन्न।

सुनीता त्रिपाठी अजय। नजऱ इंडिया 24 , ब्यूरो चीफ
जयपुर | 19 दिसंबर 2025
प्रहरी मंच की राजस्थान इकाई द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठी आज संध्या 5:30 बजे सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। यह साहित्यिक आयोजन मक़ाम ट्रस्ट के संस्थापक श्री नरेश ‘नाज़’ के आशीर्वाद तथा प्रहरी मंच की वैश्विक अध्यक्ष श्रीमती शालू गुप्ता की गरिमामयी उपस्थिति में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं संयोजन राजस्थान इकाई की महासचिव डॉ. अंजु सक्सेना द्वारा किया गया।
काव्य गोष्ठी का शुभारंभ वाणी की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती की वंदना “कागज़ तपोवन, लेखन का साधन है” से हुआ, जिसे चंचल शर्मा ‘चपल’ ने मधुर एवं मंगलमयी स्वर में प्रस्तुत किया।
इसके पश्चात देश के विभिन्न प्रांतों से जुड़े रचनाकारों ने अपनी साहित्यिक प्रस्तुतियों से गोष्ठी को सार्थक बनाया। छंदों में दक्ष राम किशोर वर्मा ने दोहा, रोला एवं कुण्डलिया के माध्यम से “मेरे मन की कामना, बढ़े विश्व में प्यार” जैसे मानवीय भावों को अभिव्यक्त किया। उत्तर प्रदेश इकाई अध्यक्ष स्वदेश चरोरा ने “रावण से सरीखे मिट जाएंगे” शीर्षक छंदबद्ध रचना प्रस्तुत की।
उषा शर्मा ‘दीपशिखा’ ने “मैं मना लेती हूँ अपना जन्मदिन” कविता का पाठ किया। अरुणा शर्मा ने “हो गई तुम खुश, बस इतना ही चाहिए था” कविता के माध्यम से महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया। चंचल शर्मा ‘चपल’ ने “चट्टान सा अडिग हूँ माँ” कविता द्वारा प्रहरी मंच के मूल भावों को सशक्त स्वर दिया।
पुष्पा माथुर ने “आगाज़ सर्दी की धूप का” कविता से शीत ऋतु की सौम्य अनुभूति को शब्दों में पिरोया। निशा बुधे झा ‘निशामन’ ने “उठकर चलना, फिर गिरना” रचना के माध्यम से जीवन की कर्मशीलता पर प्रकाश डाला। कमलेश चौधरी ने “यूँ तो कैलेंडर में तारीखें बदलती रहती हैं” कविता द्वारा देश में घटित दुखद घटनाओं पर संवेदना व्यक्त की।
सुनीता त्रिपाठी ने “मुझे हिंदी कहते हैं ये भारत वाले” कविता के माध्यम से हिंदी के राष्ट्रभाषा न बन पाने की पीड़ा को स्वर दिया। राजस्थान इकाई अध्यक्ष डॉ. कंचना सक्सेना ने “नन्ही सी चिड़िया घर आँगन में चहकती” कविता के माध्यम से स्त्री के अस्तित्व, संघर्ष और उपलब्धियों को रेखांकित किया।
कार्यक्रम के अंत में वैश्विक अध्यक्ष शालू गुप्ता ने “ये रिश्ते कितने अनोखे होते हैं” कविता प्रस्तुत कर मानवीय संबंधों की संवेदनशीलता को उजागर किया। अध्यक्षीय वक्तव्य एवं समापन प्रस्तुति में डॉ. अंजु सक्सेना ने “धीरे-धीरे ठहरी-ठहरी रहने लगी हूँ” कविता के माध्यम से एकरस होती जीवनशैली पर सार्थक विमर्श किया।
अंत में अगली काव्य गोष्ठी को नए सृजन और नव उत्साह के साथ आयोजित करने के संकल्प के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।




