शब्दों का आचरण — शिखा खुराना

एक लघुकथा
किसी कालखंड में, विंध्याचल की तराई में एक आश्रम था, जहाँ प्रातःकाल वेदध्वनि गूँजती। सायंकाल नीति-सूत्रों की वर्षा होती और मध्याह्न में दूर-दूर से आए जिज्ञासु एक ही नाम का उच्चारण करते—ऋषि वेदारण्य। प्रदेश में उनसे बड़ा ज्ञानी कोई न था। राजा उनके चरण छूता, सभाएं मौन होकर सुनतीं, और शास्त्र उनके मुख से जीवित होकर उतरते थे। वेदारण्य कहते— “क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।” “अहंकार आत्मा का पतन है।” “जो घर में करुणा नहीं रख सकता, वह संसार का पथप्रदर्शक नहीं हो सकता।” लोग भावविभोर हो उठते।
कई रोते, कई प्रण लेते। वेदारण्य मुस्कराते, उन्हें लगता, उनका कार्य पूर्ण हुआ। किन्तु, संध्या ढलते ही जब आश्रम की सीमा पार कर वे अपने गृहकक्ष में प्रवेश करते, वही ऋषि किसी और ही रूप में जन्म ले लेते। वहाँ कोई शिष्य नहीं था, कोई सभा नहीं, कोई मृदंग नहीं, वहाँ थी सावित्री, उनकी पत्नी—जो वर्षों से
उनके चरणों में नहीं,उनके क्रोध की छाया में जी रही थी। और वहाँ थे उनके दो पुत्रजिन्होंने पिता को, कभी स्नेह से नहीं,
केवल आदेश से जाना था। उस घर में
वाणी शास्त्र नहीं बोलती थी,वह चाबुक बन जाती थी। “तुम समझती क्या हो?”
“मेरे नाम का अपमान मत करो।”“मेरा ज्ञान ही तुम्हारा भाग्य है।”
सावित्री चुप रहती। क्योंकि वह जानती थी, उसकी चुप्पी में ही शांति है। पुत्र प्रश्न नहीं पूछते थे, क्योंकि प्रश्न वहां अपराध माने जाते थे। एक दिन बड़े पुत्र ने साहस किया— “पिताश्री, आप कहते हैं, करुणा सर्वोच्च धर्म है, तो फिर—”वाक्य पूरा न हो सका। एक तीखी दृष्टि उसके आत्मसम्मान को भस्म कर गई।
“मुझे शास्त्र मत सिखा,”ऋषि गरजे।
“मैं वेद हूँ।”
उस रात सावित्री ने दीप नहीं जलाया।
अंधेरे में बैठकर वह पहली बार रोई नहीं—
बस खाली हो गई। कुछ ही दिनों बाद
वह संसार से विदा हो गई।
न कोई रोग, न कोई शोक— ब�




