सुनिता त्रिपाठी’अजय का एस अन रेडियो जिन्दगी के रंग कहानी के संग कार्यक्रम में आरजे तनुजा ने लिया साक्षात्कार

1. ‘अजय’ नाम आपने अपने उपनाम के रूप में कैसे चुना?
“‘अजय’ मेरे लिए सिर्फ एक नाम नहीं, मेरी जीवन-यात्रा का सम्मान है। मेरे पति श्री अजय त्रिपाठी जी ने हमेशा मेरे लेखन में साथ दिया, मुझे प्रोत्साहित किया और मेरी क्षमता पर विश्वास किया। इसलिए मैंने अपने साहित्यिक नाम में ‘अजय’ जोड़कर न केवल उन्हें आदर दिया, बल्कि यह भी दर्शाया कि मेरी लेखनी में उनकी प्रेरणा और सहयोग का महत्वपूर्ण स्थान है।”
2. आपकी लेखन-यात्रा की शुरुआत कब और कैसे हुई?
“मेरी लेखन-यात्रा बचपन से शुरू हो गई थी। मेरे दादाजी और पिताजी दोनों ही कविताए लिखते थे, हो सकता है ये अनुवांशिक गुण मुझ मे आ गए शादी के बाद पढना शिक्षिका बनना ,कापिटिशन एक्जाम व बचो मे उलझी रहीजैसे समय मिला मे लिखती चली गई और मेरी लेखनी को नई उड़ान मीली।
3. आपकी गहरी शिक्षा ने आपकी लेखनी को क्या दिया?
“मेरी शिक्षा—ने मेरे विचारों को गहराई, स्पष्टता और विश्लेषण की दृष्टि दी। पढ़ाई ने मुझे सिखाया कि कैसे संवेदनाओं को सरल, स्पष्ट और प्रभावी भाषा में व्यक्त किया जाए। मेरी अकादमिक पृष्ठभूमि आज मेरी लेखनी की रीढ़ है, क्योंकि यह विचारों को सुव्यवस्थित और सार्थक बनाती है।”
4. हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में लिखने का कारण?
“राजस्थानी मेरी मातृभाषा है—मिट्टी की ख़ुशबू, लोक-संस्कृति, गीतों और परंपराओं से भरी हुई। हिंदी मेरी राष्ट्रभाषा है—विस्तृत, विशाल और करोड़ों तक पहुँचने वाली। इन दोनों भाषाओं में लिखकर मैं अपनी जड़ों से भी जुड़ी रहती हूँ और व्यापक पाठकों से भी संवाद कर पाती हूँ। दोनों भाषाएँ मेरे लिए भावनाओं का दोहरा सौंदर्य हैं।”
5. RSCIT और संगीत का आपकी लेखनी पर क्या प्रभाव है?
“RSCIT ने मुझे डिजिटल युग से जोड़ा वही संगीत मेरी आत्मा की भाषा है— उसने मेरी कविताओं में लय, माधुर्य और भावनात्मक गहराई जोड़ दी। जब मैं लिखती हूँ, तो शब्दों के साथ संगीत की मधुरता भी बहती है। और मैं गीतकार भी हूँ, अपनी रचना गाकर सुनाती हूँ। ‘तेरे लिए’ पुस्तक की रचना है ‘मनवा…’।”
6. पत्रकारिता और लेखन को साथ लेकर चलने का निर्णय कैसे हुआ?
“पत्रकारिता वास्तविकता से जोड़ती है, और लेखन उस वास्तविकता को सुंदर, सार्थक अभिव्यक्ति देता है। मैंने जब यह जाना कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं— एक सत्य को खोजता है और दूसरा उसे दिल तक पहुँचाता है— तभी मैंने दोनों को साथ लेकर चलने का निश्चय किया।”
7. ‘संपर्क संस्थान’ में पुस्तक विमोचन का अनुभव कैसा रहा?
“‘संपर्क संस्थान’ मेरे लिए परिवार जैसा है। उन्होंने न सिर्फ मेरी पुस्तक का विमोचन किया, बल्कि लेखन में मेरा आत्मविश्वास भी बढ़ाया। अनिल सर और पूरी टीम ने लगातार मार्गदर्शन और प्रेरणा दी। आज मैं ‘नजर इंडिया’, ‘स्वयंसिद्ध’, ‘मुंशी प्रेमचंद मंच’, ‘कलमप्रिया – जयपुर’ सहित लगभग 60से 70 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से पिछले 8–10 वर्षों से जुड़ी हूँ।” मै हार्दिक आभार करूगी न्यूज धमाका जमशेदपुर का जिन्होने मुझे राजस्थान का ब्यूरो चीफ बनाया हार्दिक आभार रघुवंशमणी का और पूरी टीम का।
8. आपके प्राप्त सम्मानों में सबसे प्रिय और यादगार कौन-सा है?
“‘हिंदी काव्य शिरोमणि सम्मान’ मेरे लिए सबसे यादगार है— और सनातन धर्म सम्मान 2025 व सम्पर्क गौरव पत्र। यह सम्मान मुझे मेरे शहर जयपुर में मिले, जहाँ मेरी मातृभाषा, संस्कृति और पहचान का प्यार शामिल है। वहीं अंतरराष्ट्रीय हिंदी काव्य रत्न नेपाल सम्मान, बुलंदी देवनागरी सम्मान राब्ता कया बोले ये तस्वीर पाकर बेहद खुशी हुई।”
9. 30 साझा संकलनों में योगदान—सबसे प्रिय कौन-सा?
“साझा संकलन एक सृजनात्मक परिवार की तरह होते हैं— जहाँ हर लेखक अपनी आत्मा का एक रंग जोड़ता है। इनमें से ‘सृष्टिमन’ संकलन मेरे दिल के सबसे करीब है, क्योंकि इसमें मेरे आस्था, भावनाओं और जीवन-दर्शन का सुंदर संगम है।”
10. परिवार का सहयोग और प्रेरणा?
“मेरा परिवार मेरी सबसे बड़ी शक्ति रहा है। चुनौतियाँ आईं, लेकिन मेरे पति और बच्चों ने हमेशा मेरा साथ दिया। मेरे पति अजय त्रिपाठी जी ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं—उन्होंने हर कठिनाई में मुझे संभाला, आगे बढ़ाया और मेरी लेखनी पर विश्वास बनाए रखा।”
11. आपकी तीनों पुस्तकों का जन्म और मुख्य थीम?
– *‘तेरे लिए’* – रिश्तों की ऊष्मा, परिवार का प्यार और भावनाओं की कोमलता।
– *‘सृष्टिमन’* – ईश्वर, प्रकृति, आस्था और आध्यात्मिक सौंदर्य का संगम।
– *‘सृष्टिमन का सागर’* – जीवन के अनुभव, संघर्ष, और सच्चाइयों की गहराई।
ये तीनों पुस्तकें मेरी जीवन-यात्रा के तीन चरणों की तरह हैं— भाव, आस्था और अनुभूति।
12. अंतरराष्ट्रीय TV चैनलों पर पुस्तक विमोचन—भाव कैसा था?
“वह पल मेरे लिए अविस्मरणीय था। दूरदर्शन, आकाशवाणी, कनाडा और दुबई के मंचों पर आना मेरा सोभाग्य रहा।और नया अनुभव भी ।
13. आने वाली नई पुस्तकें — Part 2, Part 3, और ‘लड्डू गोपाल की पालकी’?
“‘सृष्टिमन पार्ट 2’ और ‘पार्ट 3’ मेरी साझां संकलन है जिसमे वरिष्ठ व निवेदिता साहित्यिकारो को एक माला मे पिरोहा है। ‘लड्डू गोपाल की पालकी’ एक साझा संकलन है,जो कृष्ण को समर्पित है जिसमें बालकृष्ण की भक्ति, प्रेम और कोमलता को कविताओं में पिरोया गया है। ये किताबें मेरे पाठकों को एक नई अनुभूति देंगी।”
14. आपका लेखन-रूटीन कैसा है?
“मैं मन की सुनती हूँ— जब भावनाएँ उमड़ती हैं, शब्द अपने आप प्रवाहित होने लगते हैं। मेरी कलम समय नहीं देखती, भाव देखती है।”
15. एक लेखक होने के नाते कौन-सी बातें आपकी लेखनी को सबसे अधिक प्रेरित करती हैं?
“मेरी लेखनी को सबसे अधिक प्रेरित करने वाली बातें हैं — जीवन के छोटे-बड़े अनुभव, लोगों की भावनाएँ, और प्रकृति की सुंदरता। जब मुझे कोई ऐसी कहानी या भावना मिलती है जो दिल को छू जाए, तो मैं उसे शब्दों में पिरोने के लिए प्रेरित हो जाती हूँ।”
16. आज डिजिटल मंचों ने लेखन की दुनिया बदल दी है। आपको लगता है यह लेखकों के लिए अवसर है या चुनौती?
“डिजिटल मंच लेखकों के लिए एक बड़ा अवसर हैं। आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए लेखक अपनी रचनाएँ दुनिया भर में पहुँचा सकते हैं, जो पहले संभव नहीं था। हाँ, चुनौती भी है — इतनी सारी जानकारी और रचनाएँ हैं कि अपनी आवाज़ को अलग पहचान दिलाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। लेकिन अगर आप गुणवत्तापूर्ण लिखते हैं, तो डिजिटल मंच आपको बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म देते हैं।”
17. क्या आपको पाठकों से कोई ऐसा विशेष फीडबैक मिला है जिसने दिल को छू लिया हो? कुछ हमारे श्रोताओं के साथ साझा करें।
“हाँ, एक पाठक ने मुझे संदेश भेजा था कि मेरी एक कविता ने उनके कठिन समय में उन्हें संभालने की ताकत दी। उन्होंने बताया कि मेरी कविता पढ़कर उन्हें लगा कि वे अकेले नहीं हैं, और उनकी भावनाओं को किसी ने समझा है। यह फीडबैक मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान था — यही तो लेखन का असल मजा है, जब आपकी रचनाएँ किसी के दिल को छूती हैं।”
18. घर, लेखन, सम्मान, पत्रकारिता… इतनी सारी चीज़ों को आप इतनी सहजता से कैसे संतुलित कर लेती हैं?
“संतुलन बनाना वाकई चुनौतीपूर्ण है, लेकिन मेरे लिए मेरा परिवार प्राथमिकता है। मैं अपने दिन को छोटे हिस्सों में बांटती हूँ — सुबह पत्रकारिता और पढ़ाई, और दिन मे जब कविता के भाव आते है लिखती हूं शाम को और अन्य काम। सबसे जरूरी बात, मैं अपने लिए समय निकालती हूँ संगीत सुनना व गाना इससे मैं रिचार्ज हो जाती हूँ और सब कुछ सहजता से कर पाती हूँ।”
19. आप अपनी व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति किसे मानती हैं— अपनापन, सरल भाषा, या संवेदना?
“मेरी व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति संवेदना है। मुझे लगता है कि अगर आप दूसरों की भावनाओं को समझते हैं और उनके नजरिए से सोचते हैं, तो आपकी रचनाएँ भी दिल को छूती हैं। संवेदना मुझे हर किसी के साथ जुड़ने में मदद करती है, और यही मेरी लेखनी को सच्चाई और गहराई देती है।”
20. आने वाले दिनों में आप किन नए प्रोजेक्ट्स या लेखन-सपनों पर काम करना चाहेंगी?
“आने वाले दिनों में मैं ‘सृष्टिमन’ श्रृंखला को आगे बढ़ाना चाहती हूँ — इसके अलावा मेरा एक राजस्थानी मंच हो और एक नई कविता संग्रह पर काम कर रही हूँ, जिसमें सामाजिक मुद्दों और महिला सशक्तिकरण पर फोकस होगा। मेरा एक सपना है कि मेरी रचनाएँ एक फिल्म या टीवी सीरीज के रूप में बनें, ताकि मेरी कहानियाँ और भावनाएँ और भी लोगों तक पहुँच सकें।”
21. और अंत में… युवा लेखकों, विशेषकर युवा लड़कियों और महिलाओं के लिए आप क्या एक सरल, स्वर्णिम सलाह देना चाहेंगी?
“मेरी सलाह है — बस लिखो, बिना किसी हिचकिचाहट के। आपकी आवाज़ अनमोल है, और आपकी कहानियों में दुनिया को बदलने की ताकत है। अपने अनुभवों और भावनाओं पर भरोसा करें। लिखने से डरें नहीं; लिखने से ही आप अपनी पहचान बनाएँगी। और हाँ, अपने सपनों के पीछे चलते रहें — परिवार, समाज, या किसी की भी परवाह किए बिना। आपकी लेखनी आपकी शक्ति है, उसे कभी कम न आंकें।”
प्रश्न 22:
और अंत में… युवा लेखकों, विशेषकर युवा लड़कियों और महिलाओं के लिए आप क्या एक सरल, स्वर्णिम सलाह देना चाहेंगी?
उत्तर:
“बस लिखो, बिना किसी हिचकिचाहट के। अपनी आवाज़ और अनुभवों पर भरोसा करो — आपकी कहानियों में दुनिया को बदलने की ताकत है। लेखनी तुम्हारी शक्ति है, उसे कम मत आँको; यह तुम्हें सशक्त बनाएगी। अपने सपनों के पीछे चलते रहो, और कभी हार मत मानो। आपकी रचनाएँ न सिर्फ आपको, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करेंगी।” सोच पब्लिकेशन व हमरूह का हार्दिक आभार जिन्होने मेरी पुस्तके प्रकाशित की।
अंत मे सभी श्रोताओ का sn रेडियो का और तनुसा जी आपका हार्दिक धन्यावाद देती हू ।
सुनिता त्रिपाठी’अजय जयपुर राजस्थान




