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तुम्हारी यादें  — डॉ सरिता चौहान

 

जब भी तुम्हारी याद आती है
रात की तन्हाई और भी बढ़ जाती है
काश कि तुम होते मेरे पास
इस मुकम्मल जहां में सब कुछ मुकम्मल हो जाता
मुलाकात होती रोज पर दूर से
स्पर्श होता आंखों से और दिल में उतर आते
।मेरे भावनाओं के घर में सजे हुए गुलदस्ते की तरह
फूलों में खुशबू बनकर बिखेर रहे होते
काश कि तुम मेरे होते।
यादों में बस कर मन को तकलीफ मत दो
खुशबू की तरह मेरे जीवन को महका दो
उजड़े चमन को फूलों के गुलदस्तों से सजा दो
फूल भी जिंदा दिल होने चाहिए जिसकी जड़ें धरती में हो
और खुशबू हवाओं में
काश कि तुम ऐसे होते
काश कि तुम मेरे होते।।
स्वरचित
डॉ सरिता चौहान

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