उदासी चेहरे की — डॉ सरिता चौहान

जान तुम क्यों उदास रहते हो
तुम हर पल दिल के पास रहते हो बोलते तो बहुत हो भाषणों में धर्म न्याय और सामाजिक एकता की बातें कर
दिल को जीत लेते हो
संस्कृत में तो मानो तुम्हारे प्राण ही बसे हैं
मानव अनेकता में एकता के सूत्र हो तुम
सहिष्णुऔर उदार हो
फिर भी
जाने क्यों उदास हो
क्या ऐसी खता हुई है तुझसे
जिसे दिल में छुपाए रहते हो
एहसास भीतर ही है
उसे कभी मुखरित नहीं होने देते
कितनी गंभीर और विचारवान हो तुम
तुम हंसते भी हो तो दिल में छुपा राज
कभी मुखरित नहीं होता
दिल का दर्द पीड़ा बनकर बह जाता है
तुम अपने आप को दिन रात तरासते हो
आंखों की मोती लूटाने के बजाय
खुद ही लूटने लगते हो
अपने अंतस की पीड़ा को दबे मुस्कान में सहते हो
जाने क्यों उदास रहते हो
तुम हर पल दिल के पास रहते हो।
तुमने नहीं जाना कि प्यार
पैसे और कुर्सी से खरीदा नहीं जा सकता है
सम्राटों के जैसा पद है तेरा
पर आमजन से कैसे मुंखतीब होगे
आमजन की पीड़ा सिर्फ भाषणों में नहीं सुनी जाती
उनके हृदय में उतर के देखो
उनकी राहों से गुजर के देखो
उनकी समस्याओं को जूझ कर देखो
फिर समझ में आएगा
कि उनका हाल क्या है
जीवन तो सब जीते हैं
पर जीने की कल किसी किसी में होती है
राजा तो कई होते हैं
पर प्रजा हितैषी कोई कोई होते हैं
तुम यहां सब जानते हो
पर सम्राट होने के बाद खुद को क्यों खोते हो।
यही कुछ बातें थी तुमसे
तुम मिल ना सके अपने मन से
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जी ना सके अपने दिल से
जो भी हो
तुम हर पल दिल के पास रहते हो
जाने क्यों उदास रहते हो।।
स्वरचित
डॉ सरिता चौहान
प्रवक्ता हिंदी
पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज गोरखपुर उत्तर प्रदेश



