प्राइवेट स्कूलों में शिक्षकों की दुर्दशा : शिक्षा या सज़ा — संगीता झा
शिक्षण पेशा या अपराध? निजी विद्यालयों की कड़वी सच्चाई

आज के परिवेश में शिक्षक बनना सज़ा सा हो गया है शिक्षक,शिक्षिकाओं के लिए। यदि सरकारी स्कूलों की बात करें तो वहां फिर भी स्थिति बेहतर है। किंतु प्राइवेट स्कूलों की बात करें तो मौजूदा स्थिति बद से बदतर हो गई है वहां शिक्षक शिक्षिकाओं की स्थिति एक पत्थर तोड़ने वाले या कोई अन्य काम करने वाले मजदूरों से भी बुरी है। ऐसा लगता है कि जैसे शिक्षण क्षेत्र चुनकर उन्होंने जैसे कोई जुर्म ही कर दिया है।
प्राइवेट स्कूलों में शिक्षकों के लिए सजा बनने के पीछे कई कारण हैं जिनमें से कुछ मुख्य इस प्रकार हैं:
1. उनके अत्यधिक काम का बोझ, कम वेतन गैर शैक्षणिक अतिरिक्त कार्य, हिंदी बोलने पर हेय दृष्टि से देखना।
2. कठोर नियम जैसे पूरे दिन कार्य स्थल पर खड़े रहना।
3. फोन जमा करना और इस्तेमाल की अनुमति नहीं ।
4. कॉन्ट्रैक्ट पर सिर्फ और सिर्फ शिक्षकों के लिए कड़े निर्देश जैसे आप अतिरिक्त काम के लिए मना नहीं कर सकते, जोर चेंज करने की स्तिथि में एक माह का वेतन स्कूल में ही छोड़ देना।
5. सबसे बड़ी बात सारे नियम शिक्षकों के लिए जिसपे संस्थान कभी खड़ी नहीं उतरती।
6. कभी भी नौकरी ज्वाइन करते वक्त पूरी बातें शिक्षकों को नहीं बताई जाती उन्हें धोखे में रखा जाता है।
7. जैसे कि उन्हें अपने सहपाठियों से खाली समय में भी बात करना या हँसने की अनुमति नहीं होगी।
8. जब संस्था चाहे बिना नोटिस दिए कभी भी नौकरी से निकाल सकती है।
9. उन्हें नौकरी ज्वाइन करते वक्त नहीं बताया जाता है कि उन्हें एक अवधि तक ट्रायल पर रखा जा रहा है और जब मन करेगा उन्हें निकाल दिया जाएगा।
10. उन्हें किसी भी सूरत और अवस्था में किसी काम के लिए मनाही की अनुमति नहीं है, आदि।
हालांकि ऐसा हर संस्थान के साथ नहीं है, किंतु प्राय: अधिकतर प्राइवेट स्कूलों का यही हाल है उन्हें लगता है कि शिक्षकों को कुछ निम्न वेतन देकर उनपे एहसान कर उन्हें खरीद लिया गया है और यही कारण है कि आजकल बच्चे शिक्षण को अपना पेशा बनाने से कतराते हैं और किसी अन्य व्यवसाय को प्राथमिकता देते हैं। और हो भी क्यों ना क्योंकि यहां तो उन्हें हर समय एक अपराधी की तरह देखा और महसूस कराया जाता है।
” जिनके जिम्मे था देश के भविष्य का भार,
उन्हीं के लिए क्यों कांटों भरा हुआ ये संसार,
घुट ज्यों ये कार्य करेंगे कैसे बनाएंगे समाज –
क्यों खुल के जीने का फिर उन्हीं को नहीं अधिकार।”
संगीता झा “संगीत” (नई दिल्ली)




