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यादों में 2025 — कविता साव पश्चिम बंगाल

संस्मरण
साल 2025 अब कैलेंडर का एक पन्ना भर नहीं रहा, वह स्मृतियों की गठरी बन चुका है—कुछ हल्की, कुछ भारी, कुछ मुस्कान भरी और कुछ आँखें भिगो देने वाली। जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है जैसे यह वर्ष मुझे चुपचाप बहुत कुछ सिखा गया।
2025 की शुरुआत उम्मीदों के साथ हुई थी। नए संकल्प, नई योजनाएँ और मन में यह विश्वास कि इस बार समय मेरे साथ चलेगा। कुछ सपने सच भी हुए—मेहनत ने रंग दिखाया, शब्दों ने काग़ज़ पर ठिकाना पाया और संवेदनाओं ने कविता का रूप लिया। साहित्यिक यात्राएँ, मंचों की गहमागहमी, पाठकों का स्नेह—इन सबने भीतर के रचनाकार को और सजग किया। लगी लिखने, लिखना केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मा का संवाद है।
लेकिन 2025 ने केवल उजाले ही नहीं दिए। कुछ अपने दूर हुए, कुछ रिश्ते मौन हो गए। समय की आपाधापी में कई बार मन थक गया। ऐसे क्षण भी आए जब शब्द साथ छोड़ने लगे और कलम बोझ सी लगने लगी। तब याद आया कि हर रचनाकार का संघर्ष भी उसकी रचना का हिस्सा होता है। इन्हीं खालीपन भरे दिनों में आत्मचिंतन हुआ—कि क्या सच में मैं वही लिख रही हूँ, जो भीतर से उठता है?
इस वर्ष ने रिश्तों का मोल भी सिखाया। जिनसे कम अपेक्षा थी, उन्होंने संबल दिया और जिनसे बहुत आस थी, वे मौन रह गए। तब समझ आया कि जीवन में उपस्थिति का मूल्य शब्दों से बड़ा होता है। परिवार, मित्र और पाठक—इन सबका साथ किसी पुरस्कार से कम नहीं।
2025 की सबसे बड़ी देन शायद यही रही कि इसने धैर्य सिखाया। हर प्रश्न का उत्तर तुरंत नहीं मिलता, हर पीड़ा का अर्थ तुरंत समझ नहीं आता। कुछ अनुभव समय माँगते हैं, जैसे बीज मिट्टी में अँधेरे के बाद ही अंकुर बनता है।
अब जब 2025 स्मृतियों में बस गया है, तो उसके लिए शिकायत कम और कृतज्ञता अधिक है। इसने मुझे थोड़ा और मानवीय, थोड़ा और संवेदनशील बनाया। शायद यही इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि है—जिसने हमें भीतर से बदल दिया।
यादों में 2025
एक ऐसा वर्ष,
जो चला गया—
लेकिन अपने निशान
मन और शब्दों पर छोड़ गया।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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