अलाव — राजेन्द्र परिहार सैनिक

ग्रामीण परिवेश में अग्नि का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। खाना बनाने में अभी भी जलता हुआ चूल्हा और उस पर सिकती हुई ज्वार बाजरा मक्का गेहूं की रोटियां बरबस ही ध्यान आकर्षित कर लेती हैं। सर्द मौसम शहर कस्बा और गांव दोनों को ही समान रूप से प्रभावित करता है। बड़े बड़े शहरों में हीटर,गीज़र,आदि संसाधनों से सर्दी से बचाव होता है, लेकिन गांवों में, खेतों में,या परिस्थितियों वश कहीं फंस जाने पर एकमात्र प्रज्वलित अलाव ही सहारा है। यह कह सकते हैं कि कड़कड़ाती ठंड से बचने का बेसहारों जन को एकमात्र अलाव का ही सहारा है। हमें याद है हमारे बचपन में हम सब बच्चे जलते हुए चूल्हे के आस पास बैठकर बहुत ही सुकून महसूस किया करते थे। वहीं बैठकर गर्म गर्म रोटियों का आनंद लिया करते थे। गांवों से शहरों में रोजी-रोटी कमाने आए हुए मजदूरों को जलते अलाव के सहारे ही सर्द रातें बिताते हुए देखा जाता है।आग,पानी और अन्न और वायु ही जीवन के मूल आधार होते हैं इनके बिना शायद जीवन की कल्पना ही व्यर्थ है।आग और अलाव के सहारे प्रचण्ड क़हर बरपाती सर्दी का मुक़ाबला किया जाता रहा है। रात के अंधेरे में भटके
हुए पथिक को यदि दूर जलता हुआ अलाव दिखाई दे जाए तो मन में एक
आशा की किरण जाग उठती है और
उसी आशा के साथ ही कदम स्वत: उसी और उठ जाते हैं।
राजेन्द्र परिहार सैनिक



