क्या खोया क्या पाया — सुनीता तिवारी

बीता बरस जैसे यादों का एक भारी पिटारा था।
कुछ पल ऐसे, जिन्हें खोलते ही आँखें नम हो जाएँ,और कुछ क्षण ऐसे, जो मन को भर-भर कर कृतज्ञता सिखा गए।
यह वर्ष सिखा गया कि जीवन केवल सुख या दुख का नाम नहीं,
बल्कि दोनों के बीच संतुलन साधने की कला है।
सबसे अनमोल उपलब्धि रही…
बारह वर्षों के लंबे इंतज़ार के बाद पोती का जन्म।
जिस घर में वर्षों से प्रार्थनाएँ गूँजती रहीं, वहाँ नन्हीं किलकारी ने आकर
हर अधूरेपन को पूरा कर दिया।
वह छोटी-सी हथेली मानो
पूरे परिवार का भविष्य थाम लाई।
उस एक मुस्कान ने वर्षों की तपस्या को सार्थक कर दिया।
यह पाया तो लगा,ईश्वर देर करता है, पर अंधेर नहीं।
पर इसी वर्ष ने मानव संबंधों की कड़वी सच्चाई भी दिखाई।
किसी नजदीकी रिश्तेदार द्वारा विश्वासघात
मन पर गहरे घाव छोड़ गया।
जिस पर आँख बंद कर भरोसा था,
उसी ने भरोसे को सबसे ज्यादा तोड़ा।
शब्द कम पड़ गए और चुप्पी बहुत कुछ कह गई।
यह खोया
न सिर्फ विश्वास,बल्कि रिश्तों की वह मासूम समझ भी,जो अब पहले जैसी नहीं रही।
और जैसे दुखों की परीक्षा बाकी थी,
वैसे ही घर से गहनों की चोरी
ने सुरक्षा और अपनापन दोनों छीन लिया।
वे गहने सिर्फ धातु नहीं थे,उनसे जुड़ी थीं स्मृतियाँ,
कठिन समय में बचाकर चिल्लर बॉक्स में भरे सिक्कों से यह गहने
बने थे
और भी जीवन के कई पड़ाव।
उस दिन समझ आया…
संपत्ति से बड़ा नुकसान
मन की निश्चिंतता का होता है।
फिर भी,बीते बरस की थाली में अगर तौल कर देखा जाए,तो दुख भारी जरूर थे,
पर आशा ने उन्हें झुकने नहीं दिया।
पोती की हँसी ने सिखाया कि जीवन रुकता नहीं,आगे बढ़ता है।
मैंने खोया अंधा विश्वास,
निश्चिंत नींद,और कुछ अमूल्य वस्तुएँ।
पर पाया धैर्य,परख की दृष्टि,और यह विश्वास
कि हर अंधेरे के बाद
कोई न कोई दीप जरूर जलता है।
बीता बरस यादों केपिटारे में सुख दुख दोनों रख गया पर
जाते जाते जीने का नया अर्थ भी दे गया।
सुनीता तिवारी




