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मैं और मेरा साहित्य — लेखिका: पल्लवी राजू चौहान कांदिवली, मुंबई

 

साहित्य के प्रति मेरी रुझान बालपन से ही थी। मुझे कहानी और उपन्यास पढ़ने का बहुत शौक था। मेरे पिताजी ब्रिज बिहारी जी उर्फ ब्रिज बिलास प्रसाद स्टेट गवर्मेंट महाराष्ट्र के महालेखा विभाग में हिंदी के उच्च अधिकारी सी ई ओ के पद पर थे और फिल्म उद्योग में गीतकार ब्रिज बिहारी के नाम से प्रसिद्ध थे, जिसकारण घर का पूरा वातावरण साहित्यिक भावनाओं से ओतप्रोत था। मेरी कहानी उपन्यास में रुचि होने के कारण मैंने डिग्री एस. एन. डी. टी. से मुख्य विषय हिंदी से ही की थी। मुझे हिंदी विषय के साथ अंग्रेजी भी मुख्य के रूप में एस. एन. डी. टी. यूनिवर्सिटी, एम एम पी शाह, माटुंगा से करने का सौभाग्य मिला। कॉमर्शियल क्षेत्र में जॉब करने के बावजूद मैंने एम. ए. और एम. फिल. करेस्पॉन्डेंस, चर्चगेट के एस. एन. डी. टी. से पूरी की थी। एम. ए. के दौरान कॉरेस्पॉन्डेंस के लेक्चर के लिए हर रविवार को मुझे क्लास अटैंड करने के लिए चर्चगेट जाना होता था। कॉमर्शियल जॉब और साहित्य का कोई मेल नहीं था, लेकिन अपनी इच्छा के अनुरूप मैंने इस जॉब को जारी रखा और साथ ही साथ एम. फिल करने के बाद अनुवादक डिप्लोमा में एडमिशन ले ली और एक साल बाद अनुवादक डिप्लोमा का प्रमाण पत्र भी प्राप्त कर ली। मेरी बहुत सी रचनाएँ मासिक, साप्ताहिक और दैनिक पत्रिकाओं में खूब छपी। मेरा घरौंदा मैगज़ीन में भी काफी रचनाएँ छपी। सशक्त जनादेश, मेरा घरौंदा में तो रचनाएँ छपती ही थीं, बल्कि इसके अतिरिक्त मैंने होम्योपैथिक मैगजीन और पेस मेकर ऑफ मैटीरिया मेडिका बुक का भी अनुवाद की थी। इसके बाद हिंदी प्रूफ रीडर, अनुवादक और शिक्षक के तौर पर कार्यरत रही।
अनुवाद और संपादकीय को मैंने अपने जीवनशैली का एक हिस्सा बना दिया। फिर साल 2021 में मैंने पी. आर. सी. मीडिया, साहित्य एक दर्पण का वेबसाइट खोला, जिसमें मेरी साहित्यिक रचनाओं को ही नहीं प्रमोट की, बल्कि अन्य बुद्धिजीवी साहित्यकारों के संपर्क में आने के बाद मुझे साहित्य के प्रति रूझान होने के कारण जो दशा और दिशा मिली, उसके लिए सभी साहित्यकारों का मैं आभार प्रकट करती हूँ। आज साहित्य मेरा जीवन बन चुका है। अब बिना साहित्य के वास्तव में मेरा अपना अस्तित्व नहीं नज़र आता। मैंने कई कहानी, लेख, एक काव्य संग्रह, आलेख, संस्मरण लिखी है। उपन्यास लिख रही हूँ। इसीलिए मेरा संपूर्ण जीवन अब केवल साहित्य को समर्पित है। यही मेरा लक्ष्य और ध्येय है। यही मेरा जीवन है।
लेखिका: पल्लवी राजू चौहान
कांदिवली, मुंबई

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