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प्रेम और कर्तव्य — सुनीता तिवारी

 

प्रेम में त्याग की भावना प्रधान होती है इसमें तनिक भी स्वार्थ नहीं होता।
यही त्याग की वृत्ति आत्मा को शुद्ध रखती है
प्रेम में हासिल नहीं करना चाहिए सिर्फ देय भाव होना चाहिए।
यदि बदले में प्रेम चाहेंगे तो प्रेम की भावना खो जाती है और शर्तों में
बंधने लगता है।
मानव जीवन में महत्वपूर्ण कार्य होते हैं जिन्हें सभी पूरा करते हैं और यही कार्य कर्तव्य कहलाते हैं।
मनुष्य का सबसे उत्तम कर्तव्य स्वयं की देखभाल करना है और अपने परिवार की भी देखभाल करना है।
मानव के उत्तरदायित्व यही है कि वह सबसे प्रेम करे।
प्रेम औऱ कर्तव्य दोनों एक दूसरे के
पूरक है किसी के प्रति प्रेम है तो कर्तव्य भी होगा।
प्रेम में दूसरे के लिए कुछ कर गुजरने का भाव होता है।
प्रेम और कर्तव्य सदा साथ साथ चलते हैं।
यदि किसी से प्रेम नहीं तो उसकी तरफ ध्यान ही नहीं जाएगा।
प्रेम ही कर्तव्य का बोध कराता है जब दो विपरीत इंसान अलग अलग जगह से आकर एक दूजे के साथ जुड़ते है तो प्रेम के ही कारण जुड़ेंगे और उनमें प्रेम भी होगा ही।
प्रेम के कारण ही आजीवन कर्तव्य निभाते हैं।
वह दोनों अकेले नहीं उनके परिवार भी होते हैं उन परिवार जनों की सुख सुविधा का ध्यान भी रखना होता है।
प्रेम और कर्तव्य साथ में रखकर चलने वाला इंसान बहुत सुखी रहता है।
मनुष्य अपनी नैतिक भावना तथा अंतःकरण की प्रेरणा से ही सर्वोच्च कार्य करता है जो घर परिवार समाज में श्रेष्ठ होता है।
कर्तव्य प्रेम से ही सम्पन्न होते है यदि प्रेम नहीं तो कर्तव्यों को अलग ही जानिये।

सुनीता तिवारी

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