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लघुकथा: दोस्ती कहानीकार: राजेश कुमार ‘राज’

 

पुराने समय की बात है। रामसिंह और मुंशीराम जानीपुर गांव में रहते थे। दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते थे और गांव वाले उनकी #दोस्ती की मिसाल दिया करते थे। रामसिंह एक सम्पन्न किसान था जबकि मुंशीराम छोटी जोत का ग़रीब किसान।‌ उनके माली हालात कभी उनकी दोस्ती के बीच नहीं आये। लेकिन दोनों की पत्नियाॅं और परिजन इस दोस्ती से खुश नहीं थे। कुछ ईर्ष्यालु गाॅंव वाले भी दोनों के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश करते रहते थे।

दुर्भाग्यवश, एक दिन दोनों के बेटों के बीच गुल्ली-डंडे के खेल में कहासुनी हो गई।
“तुम बेईमानी कर रहे हो”, मुंशीराम के बेटे ने रामसिंह के बेटे पर आरोप लगाते हुए कहा।
“तुम बेईमान हो और तुम्हारा बाप भी बेईमान है। मेरे पिता के साथ लग कर फायदा उठाता है”, रामसिंह के बेटे ने पलटवार किया।
कहासुनी लड़ाई में तब्दील हो गई और दोनों बच्चों को चोट आ गई। दोनों बच्चों ने अपने-अपने परिवारों में बढ़ा -चढ़ा कर बातें बताई जिसकी वजह से रामसिंह और मुंशीराम के बीच मतभेद पैदा हो गये।

कुछ दिनों बाद मुंशीराम की बेटी की शादी थी। बारात आयी लेकिन वरपक्ष ने तयशुदा से ज्यादा दहेज की मांग रख दी जिसे पूरा करने में मुंशीराम असमर्थ था। बिना शादी के बारात वापस जाने लगी। इस बात का पता जब रामसिंह को लगा तो उसने अपने मित्र की इज्ज़त बचाने का मन तुरन्त बना लिया। वह अपने पुत्र के साथ जनवासे में पहुॅंचा और वरपक्ष को समझाने की कोशिश की लेकिन लालची थे कि माने ही नहीं। रामसिंह ने लालची वरपक्ष और बारात को भगा दिया। मुंशीराम उदास हताश बैठा था। रामसिंह उसका हाथ पकड़ कर बोला, “मेरे रहते मेरे दोस्त की इज्ज़त से कोई खिलवाड़ नहीं कर सकता। बिटिया को बुलाओ और फेरों की तैयारी करो।”
मुंशीराम को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अचानक उसकी नज़र मण्डप की तरफ गई। उसकी आश्चर्य मिश्रित खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उसने मण्डप में दूल्हे के स्थान पर रामसिंह के बेटे को बैठा देखा।
“दोस्त तुमने आज मेरी इज्ज़त बचा ली”, आंखों में ऑंसू भर कर मुंशीराम ने रामसिंह से कहा।
“समधी साहब अब फेरे और विदाई की तैयारी करो”, मुंशीराम को गले लगाते हुए रामसिंह ने कहा।
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