पतंगबाजी — रमेश शर्मा

चौदह जनवरी मकरसंक्रांति को पूरे देश में उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लोग पवित्र नदी/कुंड में स्नान करके सूर्य की पूजा करते हैं और दान धर्म करते हैं। जिसमें गायों को चारा डालना, गरीब लोगों को अन्न और गर्म वस्त्र देना आदि। इसके बाद देव जाग जाते हैं और शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है।
सूर्य उत्तरायण से दक्षिणायन में आ जाता है। पौष मास के बाद सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है।
जयपुर में मकरसंक्रांति को धूमधाम से मनाया जाता है। तिल के लडडू बनाये जाते हैं और पूरे शहर में पतंग उडाई जाती हैं।
इस बार भी हम छत पर पतंग उड़ा रहे थे। तभी मेरा ध्यान सड़क पर एक छोटे बच्चे की तरफ गया जो एक बुशर्ट और नेकर में फटा सा स्वेटर पहने, हाथ में झाड़ीनुमा लकड़ी लेकर पतंग लूटने के लिए आसमान में झांक रहा था। एक पतंग कट कर आ रही थी। वह उसकी तरफ पकड़ने के लिए दौड़ा। सामने से आ रहे स्कूटर से टकरा गया। स्कूटर वाला टक्कर मार कर भाग गया।
मैं तुरंत नीचे गया। उसे उठाया बेचारे के कोहनी और घुटने छिल गए थे। दर्द के मारे वह रो रहा था। मैं उसे बरामदे में लेकर आया। उसके घाव को डिकोल से साफ करके उसके पट्टी बांधी। इतनी देर में श्रीमती जी उसके लिए तिल के दो लड्डू और थोड़ी सी नमकीन के साथ चाय लेकर आईं।
मैंने श्रीमती जी की तरफ ईशारा करके कोई पुराना स्वेटर लाने के लिए कहा।
इस कड़ी ठंड में बेचारा दर्द के मारे बहुत परेशान हो रहा था। फिर उसे स्वेटर देकर विदा किया।
मन को बहुत संतुष्टि मिली। लेकिन आज के दिन कितने ही पक्षी पतंग की डोर से घायल हो जाते हैं और सड़क पर ऐक्सीडेंट के बहुत से केस अस्पतालों में आते हैं।
रमेश शर्मा




