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राजस्थानी भाषा री सुरसत वंदना ) — सत्येन्द्र मण्डेला
घरां धराणी बण माताजी,गीतां घड़ो हिलाओ नी।
मति की मथणी सूं मन मथकर,मोळी छाछ पिलाओ नी।
तन का बलोवणा मं, कुबुद्धि को दही भरयो।
लोभ, दंभ, कुंठावां की जमी हुई थर हैं।
कुण दूध गरम कीदो,कुण जाणे जावण दीदो,
पांतरो बिगाडबा मं, छोड़ी ना कसर है।
अब थूं ही दे ज्ञान घमड़का, मान को माखन खिलाओ नी ।
नाम, धाम, काम सुण, हरकोई आस करे,
घी शक्कर और मिसरी सूं भरया होसी कोठा।
पण फीको, स्वाद देख, हियो तो निसांस भरे,
आळ्या,माळ्या,थाळ्या,सब मं रस का है टोटा।
बेरस होता धगडभोज म,सरस राबड़ी मिलाओ नी।
थूं ही म्हाकी मददगारी, थूं ही म्हाकी महतारी,
थूं ही म्हाकी पालनहारी, थूं ही जामण धाय है।
कवि तो है ग्वाल थारा, डोलता फिरे बेचारा,
कलम की लाकड़ी सूं, हांके थारी गाय है।
करूँ हजूरी,आज मजूरी म,अमरत बरसाओ नी।
सत्येन्द्र मण्डेला 9460350440
https://www.youtube.com/@satyendramandela




