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कर्मवीरा — ललिता भोला सिंह — नरेश चन्द्र उनियाल,

 

दिनाँक 07 दिसम्बर सन् 2025 को भोलानाथ साहित्य एवं समाजसेवी संस्था, जयपुर, राजस्थान द्वारा मुझे कवि सम्मेलन में शामिल होने एवं काव्य रत्न सम्मान से सम्मानित किये जाने का स्नेहिल आमंत्रण मिला।
इस संस्थान की संस्थापिका/ अध्यक्षा आदरणीया ललिता भोला सिंह जी से मुलाकात करके लगा कि किसी दिव्य आत्मा से मुलाकात हो रही है।
ललिता जी से मिलते ही लगा कि इस इंसान के अन्दर कुछ बात है…. यह इंसान आम दुनिया से कुछ अलग मिट्टी का बना है, इस इंसान के अन्दर कुछ ऐसा है, जिसे दुनिया को जानना चाहिए। बस मैंने तुरन्त फैसला लिया कि ललिता भोला सिंह जी के बारे में कुछ लिखना है मुझे…
और मैंने आज एक माह बाद याने जनवरी 2026 को यह आर्टिकल लिखने को कलम उठाई है। इस बीच मैंने ललिता सिंह जी से उनके बारे में जानकारी जुटाई। उनके जीवन को जानने का प्रयास किया।
वर्तमान में ललिता भोला सिंह जी जयपुर, राजस्थान में निवास करती हैं। वह एक शिक्षिका, साहित्यकारा और एक श्रेष्ठ समाज सेविका हैं।
ललिता भोला सिंह का जन्म बिहार राज्य के दलसिंह सराय में हुआ था। मात्र चौदह वर्ष की उम्र में ही इनका बाल विवाह हो गया।विवाह के बाद मायके नरकटियागंज में ही मतिसरा कुंवर बालिका उच्च विद्यालय से दसवीं की परीक्षा देकर जयपुर (राजस्थान) आ गईं। यह उम्र सिर्फ विद्यालयी पढ़ाई-लिखाई और हंसने खेलने की होती है। सांसारिक दायित्व निर्वहन करने हेतु नही।
बाल विवाह के कारण ललिता जी की पढ़ाई अधूरी रह गई थी। बाल मन में पढ़ाई-लिखाई की लालसा रह गई थी। ललिता जी रात में पढ़ाई के ही सपने देखती थीं, उन्हें सपना आता था कि वह परीक्षा देने कॉलेज जा रही हैं ..…किंतु जब आंखें खुलती तो हकिकत से दो चार होकर वह मन मसोस कर रह जातीं थीं।
खैर…..दिन व्यतीत हुए… ललिता जी की गोद में एक पुत्र और एक पुत्री आ गई। इस तरह घर- गृहस्थी और बच्चों के लालन पालन में वह अपना (पढ़ने-लिखने का ) सपना भूल चुकी थीं। उन्हें पढ़ना- लिखना और कविताएं लिखना बहुत अच्छा लगता था। किन्तु परिस्थितियों ने उन्हें यह सब छोड़ देने के लिए विवश कर दिया था।
ऐसे माहौल में ललिता जी के पिताजी स्व. भोलानाथ जी ने हमेशा ललिता जी को प्रोत्साहित किया, उन्हें कविता लिखने को प्रेरित किया। वे कहते थे कि, “बेटा! हमेशा लिखती रहना।” ये शब्द आज भी ललिता जी के कानों में गूंजते हैं।
अच्छी बात यह हुई कि अब ललिता जी के बच्चे बड़े होने लगे थे। उन्हें भी माँ की इच्छाओं का भान हुआ, तो वे भी अपनी माँ को आगे बढ़ने, पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करने लगे। जब बेटी प्रिया ने ग्यारहवीं उत्तीर्ण किया तो अपने छोटे भाई मोहित के साथ मिलकर बारहवीं के लिए माँ का भी फॉर्म भर कर जमा कर दिया। जब-जब ललिता जी बच्चों के गृहकार्य को करवाने उनके साथ बैठतीं, तब-तब बच्चे उन्हें पढ़ने को प्रेरित करते कि मम्मी आप भी पढ़ लीजिये, अन्यथा अनुतीर्ण हो जाएँगी। तीनों विद्यार्थी ( माँ, बेटा और बेटी ) साथ-साथ पढ़ने लगे। इसका सुफल यह मिला कि सन् 2015 में बेटी के साथ ही ललिता जी भी इंटरमीडिएट उत्तीर्ण हो गईं।
बस ललिता जी के हौसले को जैसे पँख लग गये। उन्होंने अगले वर्ष ही सन् 2026-17 में एन.टी.टी. टीचर ट्रेनिंग ली और 2019 में सरकारी नौकरी परीक्षा के लिए कोचिंग क्लास ज्वाइन कर लिया। मेहनती ललिता जी पहली बार ही जनरल रैंक में पास हो गईं।
यद्यपि वह किसी कारणबस नौकरी नहीं लग पायीं, किन्तु कई वर्षो के बाद पढ़ाई शुरू करके इतनी कठिन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने की खुशी उनके चेहरे पर आज भी देखी जा सकती है। वे कहती हैं कि उस खुशी के एहसास को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। आख़िरकार ललिता जी ने पढ़ाई के लिए उम्र को धत्ता बताकर हिन्दी विषय में पोस्ट ग्रेज्युएशन की डिग्री प्राप्त कर ली। उनकी यह उपलब्धि उन सबके लिए प्रेरणास्रोत है, जो सफलता प्राप्त न होने के लिए कई कारण गिना देते हैं या कई बहाने बना देते हैं।
खैर… ललिता जी ने तो बहुत कुछ सोचा हुआ था…. पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों की देखभाल, उनकी पढ़ाई की जिम्मेदारी, कविता लेखन और इससे भी बढ़कर समाज सेवा, ये सब उनकी दिनचर्या में शामिल थे।
ललिता भोला सिंह जी के जीवन में एक मील का पत्थर तब स्थापित हुआ, जब एक राज्य स्तरीय कविता लेखन प्रतियोगिता में आपको निर्णायक के रूप में आमंत्रित किया गया, और सरकार की तरफ से सम्मानित किया गया। पुनः मंत्रालय स्तर से जिला स्तरीय कविता लेखन प्रतियोगिता में भी आपको निर्णायक के तौर पर आमंत्रित किया गया और सम्मानित किया गया।
ललिता जी के पिता स्व. भोलानाथ जी बिहार के एक सुप्रसिद्ध लोक साहित्यकार थे। अर्थात् घर पर साहित्यिक माहौल था तो इस माहौल से ललिता जी भी अछूती नहीं रहीं और परिणामस्वरुप वह भी लेखन कार्य करने लगीं। आज ललिता जी एक उत्कृष्ट व स्थापित कवियत्री हैं, जो बेहद मधुर कंठी भी हैं। अपने शिक्षण कार्य से उन्हें जब-जब भी समय मिलता है, वे उस समय का सदुपयोग लेखन कार्य में करती हैं।
ललिता भोला जी की रचनाओं में समसामयिक विषय, नारी अस्मिता, अपनी माटी से जुड़ाव और भाई चारे की मिठास स्पष्टत: परिलक्षित होते हैं।
प्रसार भारती, आकाशवाणी से वह कई बार काव्य पाठ कर चुकी हैं और आज भी नियमित रूप से आकाशवाणी से उनका काव्य पाठ होता रहता है। इसके अलावा कई राज्यों में उन्हें कवि सम्मेलन में आमंत्रित किया गया है और सम्मानित किया गया है।
उनकी पहली प्रकाशित साझा काव्य संग्रह का नाम “शब्द-पुष्प” है।

आज जयपुर, राजस्थान में शिक्षण कार्य करती हुई ललिता सिंह जी एक और विशिष्ट कार्य कर रही हैं, वह अपने पिता स्व. भोलानाथ जी की साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। उन्होने भोलानाथ साहित्य एवं समाज सेवा नाम से एक संस्था स्थापित की है, जिसके माध्यम से वह हर वर्ष अपने पिता की जन्म जयंती के अवसर पर 07 दिसम्बर को कवि सम्मेलन आयोजित कर कवियों को सम्मानित कर रही हैं। ललिता जी न केवल वरिष्ठ एवं स्थापित साहित्यकारों को ही सम्मानित करती हैं, बल्कि नवोदित कलमकारों को भी मंच प्रदान कर उन्हें भी आगे बढ़ने में भरपूर योगदान कर रही हैं।
जीवन में हर बाधा और कठिनाई के समय पर भी सदैव मधुर मुस्कान बिखेरने वाली कर्मवीरा, वीरांगना, साहित्यकारा और शिक्षिका ललिता भोला सिंह ‘सखि’ को मेरा कोटिशः नमन।
नरेश चन्द्र उनियाल,
(अध्यापक, कवि, लेखक एवं समीक्षक),
“कमली कुटीर”
देहरादून, उत्तराखण्ड।

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