संघर्ष के दिनों की यादें -भूमिका शर्मा

मन मेरा सोचे,उम्मीद की राह पकड़कर,उम्मीद करुँ किसी से और सोचूँ कि वह मेरी हकीकत की राह को आसान बनायेगा।नहीं समझ में आया आसान नहीं संघर्ष है साथ मेरे।
पर जीवन में आशा तो बहुत रखते है,पर हर उम्मीद जरुरी तो नहीँ कोई पूरा ही करे।वही संघर्ष है कि हम सोचते हम खड़े है किसी से उम्मीद लगाए बैठे है।
हम सोचे उम्मीद रखकर हम आशावादी बन जाएंगे। पर जीवन में शूल की डगर भी तो है। किसी पर उम्मीद करके हम हमेशा ही पार कर जाये यह संभव नहीं है।वो संघर्ष में हमें ही चलना है और आगे बढ़कर जाना है।
अधिक उम्मीद करने से हर चीज नहीं मिलती।जीवन में हर पथ पर राह आसान ही हो यह भी संभव नहीं है।अधिक उम्मीद आक्रोश ला सकती है,हर राह पर हर कुछ नहीं होता।कुछ ना कुछ तो ऐसा होता है छूट जाता है।
इस मझधार में हम सोचे कहाँ है उम्मीद और किसका इन्तजार जो हमारी उम्मीद के ख्वाब को हकीकत में बदले।
वो संघर्ष के दिन याद है मुझे ..
-भूमिका शर्मा
शिक्षिका और लेखिका
ग्वालियर (मध्यप्रदेश)




