संस्मरण — लता शर्मा तृषा

हमारे शहर के पास एक छोटा सा गांव है वहां शिव जी का भव्य मंदिर बना है जहां माघ और सावन माह में भारी मेला लगता है साधु संतों का भी काफी जमावड़ा रहता है।
सावन में श्रद्वालुओं का तांता लगा रहता है ऐसी मान्यता है वहां के भोलेनाथ नि:संतानों को संतान देने वाले हैं , मनौती के लिए लोग बाबा के दरबार में झोली फैलाते बाबा उनकी मनोकामना पूरी करते हैं।अभी तीन चार साल पहले की बात है मैं अपने बेटे, दामाद,बेटी व नाती संग सावन में जल चढ़ाने गई थी भीड़ भारी थी तो जल का लोटा व पूजा सामग्री सभी बेटा लेकर एक हाथ में मेरा हाथ पकड़ा बड़ी मशक्कत से दर्शन करवाया जब हम बाहर निकले द्वार पर कुछ नागा साधु बैठे थे कई श्रद्धालु उनके चरण परण लग रहे थे हम जल्दी से निकलने लगे एक बाबा बोले दान दो मैंने एक पचास का नोट दिया पर उनमें से एक बाबा दामाद से अंगूठी जो सोने का था मांगने लगा जाने ही नहीं दे रहे थे दामाद को और पांच सौ रुपए देने के बाद दामाद को आने दिये।यह संस्मरण लिखने का प्रयोजन यही है क्या किसी साधू संत को ऐसा करना चाहिए उसमें भी नागा साधु वे तो अनंग होते हैं फिर…!
लता शर्मा तृषा




