संस्मरण : 2025 — आत्मबोध से आत्मविश्वास तक की यात्रा – शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’

वर्ष 2025 मेरे जीवन में केवल एक कैलेंडर वर्ष नहीं रहा, बल्कि अनुभवों, सीखों और आत्मचिंतन का ऐसा खज़ाना बन गया, जिसने मेरी सोच, मेरी दिशा और मेरे उद्देश्य—तीनों को नई परिभाषा दी। यह वह वर्ष रहा, जिसने मुझे ठहरकर खुद को देखने, परखने और फिर नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का अवसर दिया।
मैं हमेशा जी-तोड़ मेहनत करने वालों में रही हूं। वर्षों तक बिना अपेक्षा, बिना प्रश्न किए, पूरी निष्ठा से कार्य करती रही। पर 2025 में पहली बार यह एहसास हुआ कि केवल मेहनत करना ही पर्याप्त नहीं, उसकी सार्थकता भी उतनी ही आवश्यक है। जब यह अनुभव हुआ कि कहीं-कहीं मेरी मेहनत का सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा, तो मन ने प्रश्न किया—और उसी प्रश्न ने मुझे स्वयं के लिए खड़े होना सिखाया।
मैंने सीखा कि मेहनत ज़रूर करनी चाहिए, पर अपनी शर्तों पर, अपने उद्देश्य के लिए। यही वह मोड़ था, जहां मैंने अपने दम पर, अपने लिए मेहनत शुरू की। धीरे-धीरे आत्मविश्वास लौटने लगा और 2025 के मध्य तक यह मेहनत रंग लाने लगी। आत्मसंतोष और आत्मसम्मान का जो अनुभव मिला, वह शब्दों से परे है।
इसी आत्मविश्वास की नींव पर एक सुंदर विचार ने आकार लिया, साहित्य के माध्यम से लोगों को जोड़ने का। परिणामस्वरूप लगभग 2000 लोगों को जोड़कर एक सशक्त, स्नेहिल और जिम्मेदार साहित्यिक परिवार का निर्माण हुआ। यह कोई साधारण समूह नहीं, बल्कि ऐसा परिवार बना, जहां हर सदस्य बिना किसी प्रतियोगिता भाव के, कदम से कदम मिलाकर साथ चलता है। यहां न कोई बड़ा है, न छोटा, सब समान हैं, सब साहित्य सेवा के पथिक हैं। इसी विचारधारा से “साहित्य संगम मंच” की स्थापना 28 अप्रैल 2025 को हुई। मंच का उद्देश्य कभी प्रतिस्पर्धा नहीं रहा, बल्कि साहित्य की सेवा, रचनाकारों का मनोबल बढ़ाना और उनकी प्रतिभा को सम्मानजनक मंच देना रहा। हर आयोजन, हर गतिविधि में यही प्रयास रहा कि कोई भी रचनाकार स्वयं को अकेला न महसूस करे। मेहनत, समर्पण और पारदर्शिता का फल अगस्त 2025 में तब मिला, जब साहित्य संगम मंच को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हुई। यह केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि उस विश्वास की स्वीकृति थी, जो सैकड़ों रचनाकारों ने मंच पर जताया था। उस क्षण यह एहसास और गहरा हुआ कि जब उद्देश्य पवित्र हो और प्रयास ईमानदार तो सफलता स्वयं रास्ता बना लेती है।
आज जब 2025 की स्मृतियों को पलटकर देखती हूं, तो मन कृतज्ञता से भर उठता है। यह वर्ष मुझे टूटना नहीं, निखरना सिखा गया, चुप रहना नहीं, स्वर बनना सिखा गया। 2025 मेरे लिए आत्मबोध से आत्मविश्वास तक की यात्रा बनकर सदैव स्मृतियों में जीवित रहेगा।
शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’




