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शिक्षा स्वास्थ्य न्याय — विनोद कुमार शर्मा

किसी भी देश की प्रगति में उस देश की शिक्षा का स्तर प्रारूप अंतरराष्ट्रीय स्थिति स्वास्थ्य और सरल सुलभ लेकिन कठोर न्यायायिक व्यवस्था होना आवश्यकत होती l
आज 77 वर्षों बाद भी आरक्षण लागू क्या जिनको मिलना चाहिए उन तक पहुंच पाया जो लाभ लेकर फायदा उठकर सम्पन्न हो गए उनको क्रीमी लेयर मानकर स्वंम लाभ दूसरे निर्धनों वंचितों के लिए नहीं छोड़ना चाहिए एक व्यवस्था जो कुछ वर्षो के लिए बनाई गई और उसके लाभ सबसे निचले स्तर पर नहीं पहुंची तो सिस्टम के दोष दूर कर समीक्षा नहीं होना चाहिए l
77 वर्षों तक सामाजिक न्याय के नाम पर 90% अंक बालों को उसके अधिकारों से बंचित रखना कब तक चलेगा एक के हिस्से को दूसरे को देना अन्याय है अब पुनर्विचार की अति आवश्यकता l
आज जो विकसित देश हैं उनमें शिक्षा स्वास्थ्य मौलिक अधिकार जो सर्वसुलभ और निःशुल्क है उनमें भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी और दुराचार चोरियां नगण्य है क्यों!! उन देशों के कानून सख्त और सिस्टम पारदर्शी है
वैसे भी हमारा कानून संविधान अन्य देशों की नकल करके बनाया जो 77 वर्ष पुराना हो चुका आज क्यों न उसकी समीक्षा कर उसमें आमूलचूल परिवर्तन कर कमियों को दूर किया जाय यदि अपराध होता आरोपी को सजा नहीं होती तो सबूत नहीं जुटाने की सजा जांच एजेंसी को क्यों न मिले और अपराध हुआ आरोपी बरी तो अपराध करने बाला जो भी कोई उसे खोजने की जरूरत क्यों नहीं समझी जाती
समय बद्ध न्याय न मिलना अन्याय माना जाना चाहिए दुष्कर्म भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी चोरी डकैती अपहरण में कठोरतम सजा के प्रावधानों की आवश्यकता झूठी गवाही पर कठोर सजा का प्रावधान अति आवश्यक समयबद्ध निश्चित अवधि में फैसले आने लगें तो अपराध स्वत समाप्त होंगे न्याय की गरिमा बढ़ेगी l
विकसित देश होने के स्वप्न लचर कानून व्यवस्था बौध्दिक हनन प्रतिभा पलायन और भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी वोट बैंक और जातिगत चुनावों से पूरे नहीं किए जा सकते l
विनोद कुमार शर्मा

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