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एल डी हॉस्टल के सुहाने दिन  — हसमुख बी. पटेल, ‘हर्ष’-’परख’

 

जीवन की दौड़ जब साँसों से आगे निकल जाती है, जब काम का पहाड़ हर सुबह दरवाज़े पर खड़ा मिलता है, तब स्मृतियाँ ही एकमात्र छाँव बनती हैं। ऐसे ही क्षणों में मन चुपके से लौट जाता है—एल डी हॉस्टल के उन सुहाने दिनों में, जहाँ चिंताएँ हल्की थीं, दोस्तों का समूह बड़ा था और हँसी भारी।

आज दफ़्तर की फाइलों, समयसीमा और जिम्मेदारियों के बीच बैठा हूँ, पर मन की खिड़की खुलते ही एक अलग दुनिया सामने आ खड़ी होती है। लंबी-सी गलियारे वाली वह इमारत, ‘ग्रीन रूम’ का अविस्मरणीय नाम, दीवारों पर चिपके पोस्टर, दरवाज़ों पर लटके नाम-पट्ट, कैंटीन की उपमा व साथ में पुराने नग़मे और कमरों से आती अलग-अलग धुनें—सब जैसे अब भी वहीं हैं। रात के सन्नाटे में भी जहाँ सन्नाटा नहीं होता था; कोई गिटार बजा रहा होता, कोई परीक्षा की तैयारी में किताबों से जूझ रहा होता, रात तीन बजे तक बैडमिंटन खेलते थे, तो कोई अपने घर की याद में चुपचाप छत निहार रहा होता।

हॉस्टल के दिन अनुशासन से अधिक अपनापन सिखाते थे। सुबह की नींद तोड़ती घंटी पर सबका एक साथ बड़बड़ाना, मेस की साधारण-सी दाल पर भी मिलकर मज़ाक करना, रविवार को फीस्ट का सुहाना आस्वाद लेना और महीने के अंत में पैसों की कमी को हँसी में उड़ा देना—ये सब छोटे-छोटे पल ही तो असली संपत्ति थे। वहाँ किसी के पास बहुत कुछ नहीं था, पर किसी को कमी भी नहीं लगती थी। एक की किताब सबकी किताब होती, एक का दुःख सबका दुःख। *वही तो यादगार दिन थे जब हम दोस्तों ने मिलकर एक ना भूलनेवाले हस्तलिखित साहित्य सर्जन “टहुको “ का निर्माण किया था।*

परीक्षा के दिनों में कमरे युद्धभूमि बन जाते थे। नोट्स इधर-उधर बिखरे रहते, चाय के कपों की कतार लग जाती, और आँखों में नींद से ज्यादा सपने तैरते। फिर भी, उस तनाव में भी एक अजीब-सी मिठास थी। क्योंकि पता था—यह संघर्ष अकेले का नहीं है। देर रात तक पढ़ाई के बीच अचानक किसी का चुटकुला फूट पड़ता, और पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठता। वही ठहाके आज के सन्नाटे से कहीं अधिक जीवंत थे।

त्योहारों पर हॉस्टल घर बन जाता था। जो घर नहीं जा पाते थे, वे मिलकर अपना छोटा-सा उत्सव रच लेते। कोई मिठाई ले आता, कोई रंग-बिरंगी लाइटें सजाता। परिवार दूर था, पर अपनापन पास। शायद वही दिन थे जब दोस्त सिर्फ दोस्त नहीं, परिवार बन गए थे।

अब जब जिम्मेदारियों का भार कंधों पर स्थायी हो चुका है, तब समझ आता है कि हॉस्टल ने केवल डिग्री नहीं दी, जीवन जीने की कला भी सिखाई। वहाँ सीखा—कम में खुश रहना, असफलता में भी हिम्मत न हारना, और सबसे बढ़कर, रिश्तों को सहेजना।काश, एक बार फिर से वोह खुशियाँ फिर एक बार मिले।

आज की भागदौड़ में जब थकान हावी होती है, तो मन वही पुराना कमरा खोजता है—जहाँ पंखे की आवाज़ में भी सुकून था, जहाँ भविष्य अनिश्चित था पर डर नहीं था। हॉस्टल के वे दिन शायद लौटकर न आएँ, पर उनकी सुनहरी आभा आज भी जीवन की कठोर धूप में ठंडी छाँव बनकर साथ चलती है। आज के बेइंतिहा कार्यबोज में हॉस्टल के वोह सुहाने दिन जब जब याद आते है, आँखे बरसती रहती है।

हसमुख बी. पटेल, ‘हर्ष’-’परख’
नारदीपुर-अहमदाबाद

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