“सेवानिवृत्त वरिष्ठ जन” – नरेश चंद्र उनियाल, “कमली कुंज”

लघुकथा
सोमेश आज सर्वोच्च अधिकारी के पद पर प्रमोशन पाकर अत्यंत प्रसन्न था…. अपनी सफलता का श्रेय उसने अपने परिवारजनों, बुजुर्गों और अपने अध्यापकगणों को दिया। आज वह सबके साथ अपनी खुशी बाँटना चाहता था। इस अवसर पर उसे पाठक सर की बहुत याद आ रही थी… पाठक सर, जिन्होंने हर कदम पर उसका मार्गदर्शन किया था, और वे पंद्रह वर्ष पहले सेवानिवृत्त हो चुके थे। शाम को सोमेश पाठक सर के घर पर पहुंचा।
सोमेश ने डोर बेल बजाई तो कुछ देर बाद एक बुजुर्ग व्यक्ति ने गेट खोला..वह पाठक सर ही थे..सोमेश ने उनके चरण स्पर्श किए..दोनों बैठक में आ गए थे।
सर को अपनी सफलता के बारे में बताकर और अन्य औपचारिक बातें करने के बाद सोमेश ने सर से पूछा, “सर घर में आपके अलावा और कोई दिख नहीं रहा?”
सर ने कहा-“भई दिखेगा कहाँ से? जब कोई घर में होगा तभी तो दिखेगा न! पत्नी का देहावसान हो चुका है..दो बेटे, बहुएँ और पोती-पोते हैं..दोनों बेटे सपरिवार विदेशों में हैं…और हम यहां एकाकी…. बस किसी तरह शाम सुबह दो रोटी खा रहे हैं और अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं… यह सिर्फ मेरी ही नहीं… (एक दीर्घ स्वास छोड़कर)… हर घर की और हर सेवानिवृत्ति व्यक्ति की कहानी है सोमेश…. थैंक यू ! आपने याद किया और आप मुझे मिलने आये। अब तो मेरे पास कोई मिलने भी नहीं आता।”
सोमेश हतप्रभ होकर सब सुनता रहा… उसके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं था वह वर्तमान समाज के परिदृश्य के बारे में सोचता रहा और दुखी मन से सर के घर से वापस लौट आया।
– नरेश चंद्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।




