जब मैंने हिम्मत दिखाई — सरोज शर्मा दिल्ली

बात उन दिनों की है जब मैं इफ्को उदयनगर गाँधीधाम में स्थित केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका के रूप में कार्यरत थी और अपनी तीन वर्षीय बेटी को लेकर दिल्ली से गाँधीधाम की दो रात और एक दिन की ट्रेन से यात्रा करती थी। एक बार ट्रेन में मुझे ऊपर वाली बर्थ मिली तो सामने मिडिल बर्थ पर कोई व्यक्ति सो रहा था । रात्रि के साड़े नौ बज रहे थे । मेरे पति हम दोनों को ट्रैन में बिठाकर वापस जा चुके थे। एक व्यक्ति बार – बार मेरी बेटी से बातें किए जा रहा था । थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि वही व्यक्ति टीटी के साथ कुछ बातें कर रहा है। मुझे कुछ संदेह हुआ । उस केबिन में, मैं अकेली महिला यात्री थी। मैंने उस सोते हुए व्यक्ति को जगाया और कहा कि ” इस केबिन में अगर कोई असहज स्थिति हुई तो मैं तुझे इस गाड़ी की खिड़की से बाहर फेंक दूंगी । यह सुनते ही वह व्यक्ति तुरंत उठ खड़ा हुआ और उससे जाके कछ कहने लगा । उसके बाद वह दोनों ना जाने कहाँ गए ,पूरी रात वहाँ नहीं फटके और फिर मैं और मेरी बेटी पूरी रात बड़े आराम की नींद सोकर सुबह गाँधीधाम स्टेशन पर पहुंच कर उतरे और चैन की सांस ली।
सरोज शर्मा
दिल्ली




