संरक्षक — सीमा शुक्ला चांद

एक नर गलत होकर नारी को उसकी सीमाएं दिखाता है
क्या करें कैसे करें हर घड़ी हर उम्र उसे तौर तरीके ही सिखाता है
एक इज्जत के खो जाने का डर उसके मन मस्तिष्क में यूं हावी हो जाता है
की कोमल मन संबल नारी का भी हर पल ही घबराता है
वो अनपढ़ अबला को हर बार तो इज्जत की बातों से डराता है
और पढ़ी लिखी सबला को भी उसी इज्जत की दुहाई देता जाता है
एक बार जो नारीत्व भरोसे में अपने नर के बांहों में समर्पण पाता है
वो जीवन भर बस फिर इज्जत के नाम पर लुटा खसोटा जाता है
इज्जत हर पल नारी के सिर नर बेइज्जत हो भी इज्जतदार कहलाता है
यह डर की इज्जत चली जाएगी कितनी नारियों का जीवन ही लेकर जाता है
एक नेसर्गीक कर्म प्रकृति की उत्पत्ति का जब सबंधो में रूपांतरित हो जाता है
खत्म होती है नारी ही उस पल क्योंकि नारी ही इज्जत की संरक्षक और जन्मदाता है
सीमा शुक्ला चांद




