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फरिश्ता — शिखा खुराना ‘कुमुदिनी

 

मायरा बड़े घर की बेटी थी। ऐश्वर्य और सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन ने उसकी हर छोटी-बड़ी इच्छा को तुरंत पूरा करने की आदत डाल दी थी। माता-पिता ने उसे भरपूर लाड़-प्यार तो दिया, लेकिन व्यस्तताओं के कारण वे उसे समय और संस्कार नहीं दे पाए। परिणामस्वरूप मायरा धीरे-धीरे जिद्दी और उद्दंड होती जा रही थी।

इसी बीच मायरा के पिता अपनी वृद्ध बुआ को गाँव से अपने घर ले आए। बुआजी अत्यंत शांत, शीतल और ममतामयी स्वभाव की थीं। उन्होंने घर का एक कमरा मंदिर बना लिया और प्रायः पूजा-पाठ में ही लीन रहतीं। समय मिलने पर कभी-कभार लान में टहल आतीं या खिड़की के पास बैठ जातीं।

परंतु मायरा को उनका घर में आना अखरने लगा। उसने स्पष्ट कह दिया कि बुआजी घर में रहें, लेकिन उसके जीवन में दखल न दें। बुआजी ने कुछ उत्तर न देकर मौन साध लिया।

एक दोपहर बुआजी ने खिड़की से झांककर देखा कि मायरा एक युवक से बातें कर रही है। पहले तो उन्हें भ्रम हुआ कि कोई सहपाठी होगा, पर तभी उन्होंने मायरा को उस लड़के को रात में घर बुलाते सुना। बुआजी का मन अशांत हो उठा। वे मायरा की चिंता में रात भर करवटें बदलती रहीं।

उस रात मायरा के माता-पिता किसी पार्टी में गए थे और घर की देखभाल बुआजी को सौंप गए थे। आधी रात को अचानक मायरा की भयभीत चीख ने सन्नाटा तोड़ दिया। बुआजी हड़बड़ाकर उसके कमरे की ओर दौड़ीं। दरवाज़ा अंदर से बंद था। उन्होंने जोर-जोर से खटखटाया। थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला और मायरा बदहवास रोती हुई उनके गले लिपट गई।

अंदर वह युवक नशे की हालत में डगमगाता हुआ खड़ा था। बुआजी ने बिना देर किए अपनी छड़ी उठाकर उसके सिर पर दे मारी। अचानक हुए वार से घबराकर वह युवक खिड़की से कूदकर भाग खड़ा हुआ।

बुआजी ने मायरा को अपनी बाहों में भर लिया और स्नेहिल स्वर में समझाया—
“बेटी, एक छोटी सी चूक पूरी ज़िंदगी को अंधकारमय बना सकती है। स्वतंत्रता और सुविधाओं का आनंद लेना बुरा नहीं, लेकिन विवेक और संयम का होना अनिवार्य है। यही जीवन को संवारता है।”

उस रात मायरा ने आंसुओं में डूबकर बुआजी के शब्दों को आत्मसात कर लिया। उसे अहसास हुआ कि बुआजी केवल रिश्तेदार नहीं, बल्कि उसकी जीवनरक्षक देवदूत हैं। धीरे-धीरे वह बुआजी की सखी बन गई। उनके सान्निध्य में मायरा ने अनुशासन, मूल्य और मर्यादा को आत्मसात किया।

अब उसके जीवन की दिशा बदल चुकी थी। वह केवल बड़े घर की बेटी नहीं रही, बल्कि संस्कारों और संवेदनाओं से समृद्ध एक सशक्त व्यक्तित्व बनकर उभरी।

शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’

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