संस्मरण: गांव से शहर तक की सफर — श्री पालजीभाई वी राठोड ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर-गुजरात)

मैंने जब पढ़ाई पूरी की तो मुझे एक छोटा सा गांव में प्राथमिक शिक्षक की नौकरी मिल गई।छोटा सा गांव था। सादगी का प्रतीक था।कोई भीड़ भाड़ नहीं।एकदम शांत सौम्य लगता था।सुबह शाम मंदिरों में आरती होती थी। खेतों में फसल लहराती थी।हवा में मिट्टी की खुशबू अपनेपन का एहसास कराती थी।गांव का जीवन धीमा जरूर था पर उसमें एक ठहराव था। गांव के लोग एक शिक्षक होने के नाते मुझे सम्मान देते थे। रिश्ते नाते स्वार्थ के नहीं थे। एक दूसरे से भावनाओं से जुड़ा था। गांव में बच्चों के साथ बच्चे बनकर रहना बहुत ही आनंद दायक लगता था।बच्चों के साथ बच्चे और बड़ों के साथ बड़े बनकर रहते थे।वक्त क्यों गुजर जाता ख्याल ही नहीं आता था। मैंने पूरा जीवन गांव में बिताया। नोकरी से निवृत्त भी हो गया।
जब मैं निवृत हो गया तब मेरे बेटे को शहर में नौकरी मिली। उसके साथ मैं भी शहर आया। मैंने गांव और शहर दोनों में रहने का अनुभव किया।जब गांव में था तब मुझे लगता था शहर में रहने की कैसी मजा आती होगी। शहर में आया तो पता चला शहर में पैसा है सुविधा भी है पर सुकून नहीं है।यहां दिन मशीन की तरह चलता है।लोगों के पास बैठने का वक्त नहीं है। अपने ही कार्य में व्यस्त होता है।गांव की तरह अपनापन नहीं दिखता।
शहर और गांव दोनों के अपने अपने मायने हैं।शहर आगे बढ़ाना को सीखाता है तो गांव इंसान बनना सीखता है। शहर में रहकर जब हम थक जाते हैं तो दिल से एक आवाज निकलती है;’ चल गांव की ओर…’क्योंकि गांव में जीवन कम सुविधाओं में भी ज्यादा सुकून से जिया जाता है। गांव आज भी मेरी स्मृतियों में इसी तरह बसी हुआ है। छोटी छोटी गलियां वृक्षें तालाब के पानी में नहाना घूमना फिरना बातें करना सब सब याद आता है।गांव में जहां समय रुक कर बात करता था। शहर में वह दौड़ता हुआ आदेश देने लगता है।गांव ने मुझे जड़े दी शहर ने पंख दिया। आज मैं शहर रहता हूं। मेरे भीतर गांव और शहर दोनों बसते हैं।गांव से शहर तक का ये सफर सिर्फ दूरी का नहीं था पर स्वयं को पहचान ने की यात्रा थी।
श्री पालजीभाई वी राठोड ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर-गुजरात)




