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बेटियों की सुरक्षा और शिक्षा में आनेवाली विसंगतियाँ — ऋतु उषा राय

 

आज का समय अनेक विरोधाभासों से भरा हुआ है। एक ओर विज्ञान, तकनीक और शिक्षा ने अभूतपूर्व प्रगति की है, तो दूसरी ओर सामाजिक असमानता, लैंगिक भेदभाव, असुरक्षा, डिजिटल भ्रम और मानसिक दबाव जैसी अनेक विसंगतियाँ भी हमारे सामने खड़ी हैं। ऐसे दौर में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम अपनी बेटियों को इन परिस्थितियों से सुरक्षित रखते हुए कैसे आगे बढ़ाएँ, उन्हें कैसे शिक्षित करें और किस प्रकार ऐसा वातावरण दें कि वे आत्मविश्वासी, सफल और आत्मनिर्भर बन सकें।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि शिक्षा केवल प्रमाणपत्र या नौकरी पाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करती है। जब बेटी शिक्षित होती है, तो वह अपने अधिकारों को पहचानती है, अपने कर्तव्यों को समझती है और जीवन की कठिन परिस्थितियों में संतुलित निर्णय ले पाती है। इसलिए बेटियों की पढ़ाई को कभी बोझ या खर्च न समझा जाए; यह परिवार और समाज के भविष्य में किया गया सबसे महत्वपूर्ण निवेश है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण तक, हर स्तर पर उन्हें समान अवसर मिलना चाहिए।

शिक्षा के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास भी अत्यंत आवश्यक है। घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ बेटी खुलकर अपनी बात कह सके, अपनी जिज्ञासाएँ व्यक्त कर सके और अपने सपनों को साझा कर सके। यदि परिवार संवाद का पुल बनाए रखता है, तो बेटी किसी भी समस्या या उलझन को अकेले नहीं झेलेगी। उसे यह सिखाना होगा कि आत्मसम्मान से समझौता न करे,

आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ता से “ना” कह सके और किसी भी प्रकार के अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस रखे। आत्मविश्वास ही वह शक्ति है जो उसे भीड़ से अलग पहचान दिलाता है।
आज डिजिटल युग में जागरूकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इंटरनेट और सोशल मीडिया अवसरों के द्वार खोलते हैं, लेकिन साथ ही अनेक जोखिम भी लाते हैं। इसलिए बेटियों को डिजिटल सुरक्षा, साइबर जागरूकता और व्यक्तिगत गोपनीयता की समझ देना समय की मांग है। उन्हें यह समझाना होगा कि तकनीक साधन है, साध्य नहीं। संयम और विवेक के साथ तकनीक का उपयोग ही उन्हें सुरक्षित और सशक्त बनाएगा।

प्रेरणादायक उदाहरण भी बेटियों के मन में ऊर्जा भरते हैं। जब वे देखती हैं कि इंद्रा गाँधी ने देश का नेतृत्व किया, मैरी कॉम ने सीमित संसाधनों के बावजूद विश्व मुक्केबाज़ी में पहचान बनाई,पी वि .सिंधु ने खेल जगत में निरंतर सफलता प्राप्त की और कल्पना चावला, ने अंतरिक्ष तक पहुँचकर इतिहास रचा, तो उनके भीतर भी यह विश्वास जागृत होता है कि वे किसी से कम नहीं हैं। ऐसे उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि अवसर और समर्थन मिलने पर बेटियाँ किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं।

घर में समानता का व्यवहार अत्यंत आवश्यक है। यदि बेटा और बेटी के बीच अवसरों या अधिकारों में भेद किया जाएगा, तो यह असमानता उनके मन में गहरी छाप छोड़ देगी। समान जिम्मेदारियाँ, समान सम्मान और समान अवसर ही आत्मसम्मान की नींव रखते हैं। जब बेटी को यह एहसास होता है कि वह परिवार के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना कोई और सदस्य, तब उसके भीतर आत्मबल स्वतः विकसित होता है।

आज का युग कौशल और आत्मनिर्भरता का युग है। केवल शैक्षणिक ज्ञान पर्याप्त नहीं; भाषा कौशल, डिजिटल दक्षता, वित्तीय समझ और व्यावसायिक प्रशिक्षण भी आवश्यक हैं। जब बेटी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती है, तो वह अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने में सक्षम होती है। आर्थिक स्वतंत्रता केवल आय का स्रोत नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मविश्वास का आधार भी है।

अंततः यह समझना होगा कि बेटियों को आगे बढ़ाना केवल उनका भविष्य सुरक्षित करना नहीं है, बल्कि पूरे समाज को सशक्त बनाना है। एक शिक्षित, आत्मविश्वासी और जागरूक बेटी न केवल अपने परिवार को नई दिशा देती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी संस्कार और ज्ञान की रोशनी प्रदान करती है।
बेटी को बचाना ही पर्याप्त नहीं; उसे पढ़ाना, समझाना, समर्थ बनाना और उसके सपनों को उड़ान देना ही सच्ची प्रगति है।
जब परिवार विश्वास देता है, समाज अवसर देता है और शिक्षा दृष्टि देती है, तब कोई भी विसंगति बेटियों की राह में स्थायी बाधा नहीं बन सकती।

ऋतु ऊषा राय
भदांव, मालतारी
आजमगढ़
उत्तर प्रदेश

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