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नारी — सृजन की शाश्वत धारा — कविता साव पश्चिम बंगाल

 

नारी केवल एक शरीर नहीं, वह संवेदना की वह गहरी धारा है जो जीवन को अर्थ देती है। वह सृष्टि की प्रथम प्रेरणा है, प्रकृति की कोमल मुस्कान है। उसकी आँखों में करुणा का आकाश है और उसके हृदय में अनंत धैर्य का सागर।
जब वह माँ बनती है, तो ममता का अमृत बहता है। उसकी गोद में संसार की सबसे सुरक्षित शरण मिलती है। जब वह बेटी होती है, तो घर में खुशियों की किलकारियाँ गूँजती हैं। बहन बनकर वह रिश्तों में अपनापन जोड़ती है और पत्नी बनकर जीवन के हर उतार-चढ़ाव में साथी बन जाती है।
नारी के त्याग और सहनशीलता की कहानी उतनी ही पुरानी है जितनी यह सृष्टि। वह स्वयं अनेक पीड़ाएँ सहकर भी दूसरों के जीवन में मुस्कान बोती है। उसका प्रेम सीमाओं में बँधा नहीं होता, वह हर परिस्थिति में अपने परिवार और समाज के लिए समर्पित रहती है।
आज की नारी केवल घर की चौखट तक सीमित नहीं है। वह शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, राजनीति और कला के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का उजाला फैला रही है। वह यह सिद्ध कर रही है कि यदि उसे अवसर और सम्मान मिले, तो वह आकाश से भी ऊँची उड़ान भर सकती है।
नारी वास्तव में शक्ति का दूसरा नाम है। वह सृजन की आधारशिला है, जीवन की मधुरता है और समाज की आत्मा है। हमारे शास्त्रों में भी नारी के सम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसलिए कहा गया है — “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः”, अर्थात जहाँ नारी का सम्मान और आदर होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है।
जिस समाज में नारी का सम्मान होता है, वहाँ प्रगति, संस्कृति और मानवता का दीप सदा प्रज्वलित रहता है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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