समय के आइने में समाज — सीमा पुरबा ‘ सिम्मी ‘

हमारा देश निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर है। विकास की इस अवस्था में,समय के साथ बहुत बदलाव आया है ।
समय के आइने में देखे तो, समाज बिल्कुल ही बदल चुका है और यह बदलाव निरंतर जारी है । पहले संयुक्त परिवार होते थे बच्चों के विकास में पूरे परिवार का योगदान होता था । बच्चे आदर सत्कार बड़ों से सीखते थे । रिश्तों की गरिमा समझते थे । स्त्रियों की शिक्षा का प्रतिशत बहुत कम था । स्त्रियां घर के काम तक सीमित थी । दूर संचार के साधन नहीं थे। चिट्ठी भेजी जाती थी जो काफी दिनों बाद पहुंचती थी । तकनीकी विकास नहीं था । गांव में चहलपहल बनी रहती थी , सब मुसीबत में एक दूसरे के काम आते थे । मनोरंजन के साधनों की कमी थी । बच्चे मैदानों में खेलते और बड़े चौपालों पर बैठकर हंसीमजाक किया करते थे । चारों तरफ हरियाली और लहलहाती फसलों से मन प्रसन्न रहता था । यातायात के साधनों की कमी की वजह से लोग अधिकतर पैदल ही चला करते थे, जिससे उनका स्वास्थ्य ठीक रहता था ।
आज समय के साथ समाज बिलकुल ही बदल गया है । एकल परिवार होने लग गए, जिसके कारण बच्चों के समुचित विकास में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। मोबाइल की सुविधा से, सब मोबाइल में सिमट गए है । रिश्तों में अपनापन खो सा गया है । परिवार के सदस्यों के बीच ही संवाद कम हो गए है । लोग एक अंधी दौड़ में शामिल हो गए है , जिससे हर इंसान एक स्वार्थ में सिमटा रहता है । समाज में एक दूसरे से मिलने का समय ही नहीं होता । बस दिखावे का बोलबाला है । दिखावटीपन बढ़ गया है ।
स्त्रियों की शिक्षा का स्तर काफी बढ़ गया है । स्त्रियां घर और बाहर दोनों जगह अपने को साबित कर रही है ,लेकिन अभी भी समाज में स्त्रियों को बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाया है । लोगो ने अपने आप को एक खोल में बंद कर लिया है,नतीजा अकेलापन बढ़ता जा रहा है । AI ने चीजे आसान की है लेकिन मुश्किलें भी बढ़ा दी है । लोगो में संवेदनाओं का अभाव हो गया है । लोग मुश्किल समय में अपने आप को अकेला पाते है जिससे आत्महत्या के केस बढ़ रहे है । लोग मुश्किलों में घिरे लोगों का वीडियो बना कर डाल देते है और लाइक्स कमेंट्स के पीछे भाग रहे है । समाज की गरिमा धूमिल हो गई है । समाज अपने आप में ही अपना अर्थ खोते जा रहा है।
माना कि समाज और देश विकास कर रहा है लेकिन नैतिक मूल्यों और संस्कारों का पतन भी हो रहा है। जरूरत है सही सोच और संतुलन बना कर ,समाज के विकास के साथ – साथ , समाज का सर्वांगीण विकास हो । जिसके लिए हम सब को मिलकर कदम उठाने होंगे ।
सीमा पुरबा ‘ सिम्मी ‘
स्वरचित



