बचपन– सुनीता तिवारी”सरस

काश मैं पुराने समय में लौट पाती
कभी-कभी जीवन की भागदौड़ में मन अचानक ठहर जाता है और स्मृतियों की पगडंडी पर चल पड़ता है।
आज भी जब मैं अपने अतीत के उस सुनहरे दौर को याद करती हूँ तो मन में एक टीस सी उठती है,
काश!
मैं पुराने समय में लौट पाती।
वह बचपन कितना सरल और निश्छल था।
न कोई चिंता, न कोई दिखावा।
मिट्टी में खेलना, बारिश की बूंदों में भीगना, और शाम होते ही दोस्तों के साथ गली में हँसना
यही तो मेरी दुनिया थी, घर के आँगन में माँ की पुकार, रसोई से आती रोटियों की खुशबू, और पिता का स्नेहिल अनुशासन,
सब कुछ कितना अपना और सुकून देने वाला था।
त्योहारों की रौनक भी कुछ अलग ही होती थी।
बिना किसी आडंबर के, पूरे परिवार का एक साथ बैठकर हँसना-बोलना, मिठाइयाँ बनाना, और छोटे-छोटे उपहारों में खुशियाँ ढूँढ लेना,
वह सच्ची खुशी अब कहीं खो सी गई है।
आज सब कुछ है,
सुविधाएँ, साधन, और आधुनिकता
पर कहीं न कहीं वह सादगी, वह अपनापन पीछे छूट गया है।
अब रिश्तों में वह गर्माहट नहीं रही और समय भी जैसे हाथों से फिसलता चला जाता है।
जब-जब मैं उन बीते पलों को याद करती हूँ, मन बस यही कह उठता है,
काश!
समय की धारा को मोड़ पाती और फिर से वही मासूमियत भरे दिन जी पाती।
लेकिन शायद यही जीवन का सत्य है,
समय कभी लौटकर नहीं आता, केवल यादों में बस जाता है।
इसलिए अब मैंने उन यादों को संजोकर ही जीना सीख लिया है क्योंकि वही मेरी सबसे अनमोल पूंजी हैं।
सुनीता तिवारी”सरस”




