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भूख — शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’

 

भूख दोपहर अपनी पूरी निर्दयता के साथ धरती पर उतरी हुई थी। सूरज जैसे आसमान से उतरकर सीधे गली में आ बैठा हो। हवा में धूल थी, और धूल में एक ऐसी थकान, जो शरीर से ज्यादा मन को बोझिल कर देती है।
गली के मोड़ पर एक छोटी-सी दुकान थी—टीन की छत, दीवारों पर पुरानी पपड़ी, और भीतर बैठा एक आदमी, जो अपने जीवन की गिनती भी शायद उन्हीं बिखरे हिसाब-किताबों में करता था। वह था, रामनारायण।
उसकी दुनिया सीमित थी, तौल, तराजू, मुनाफा और बचत। इन सबके बीच उसका चेहरा भी वैसा ही हो गया था, सूखा, गणनात्मक और थोड़ा कठोर।
तभी एक आकृति जैसे हवा को चीरती हुई आई। एक और, बिखरे बाल, फटा आँचल, और आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी। उसने बिना कुछ कहे काउंटर से डबलरोटी उठाई और दौड़ पड़ी।
“चोर! चोर-चोर!”
रामनारायण की आवाज़ ने गली के सन्नाटे को चीर दिया।
वह भागा। उसके कमजोर शरीर में अचानक एक उन्माद भर गया था। जैसे यह दौड़ केवल रोटी की नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व की रक्षा की हो। औरत नंगे पाँव थी। उसके तलवों को शायद अब दर्द का अहसास भी नहीं होता था। वह बस भाग रही थी—्, जैसे पीछे भूख हो, और आगे उम्मीद।
कुछ दूर जाकर रामनारायण की साँसें टूटने लगीं। वह नाले के किनारे बने चबूतरे पर बैठ गया। नाला, जिसमें गंदगी बहती थी, और उसके किनारे बैठा आदमी, जिसके भीतर भी जाने कैसी गंध जमा थी।
तभी उसे एक वर्दी दिखाई दी।
दारोगा, धीमी चाल, थकी आँखें, लेकिन भीतर कहीं एक स्थिरता लिए हुए।
“दरोगा जी… चोर भाग गई… मेरी दुकान से डबलरोटी उठाकर!”
रामनारायण की आवाज़ में शिकायत कम, अधिकार ज्यादा था।
दारोगा ने उसे देखा—जैसे वह उसके शब्दों से ज्यादा उसके भीतर को पढ़ रहा हो।
“बैठो,” उसने संक्षेप में कहा।
साइकिल आगे बढ़ी, धूल को पीछे छोड़ती हुई।
कुछ दूर पर एक झोंपड़ी थी, इतनी कमजोर कि जैसे हवा के भरोसे खड़ी हो। औरत उसी में घुसी थी।
“तुम यहीं रहो,” दारोगा ने कहा।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। झोंपड़ी के दरवाज़े पर आकर एक पल को ठिठका, जैसे भीतर जाने से पहले उसे खुद को तैयार करना हो।
अंदर अंधेरा था, लेकिन उस अंधेरे में जो दिखा, वह किसी भी रोशनी से ज्यादा तीखा था।
दो बच्चे, बिलकुल निश्चल। उनकी साँसें चल रही थीं या नहीं, यह समझना मुश्किल था। भूख ने उनके शरीर से जीवन का रंग खींच लिया था।
औरत ने काँपते हाथों से आँचल खोला। डबलरोटी जैसे कोई खजाना हो।
“ले… खा ले…” उसकी आवाज़ में माँ की करुणा थी, और अपराधबोध का कोई नामोनिशान नहीं। बच्चे उस पर टूट पड़े। सूखी रोटी उनके लिए अमृत बन गई थी। वे उसे ऐसे खा रहे थे, जैसे हर कौर के साथ जीवन वापस पा रहे हों। दारोगा की आँखें भर आईं। वर्दी के भीतर जो आदमी था, वह उस पल हार गया, और शायद पहली बार जीता भी।
वह बिना कुछ कहे मुड़ा।
बाहर रामनारायण इंतज़ार में था, “कहाँ है चोर?”
दारोगा ने जेब से एक नोट निकाला और उसकी ओर बढ़ा दिया—
“ये लो… तुम्हारी डबलरोटी के पैसे।”
शब्द छोटे थे, लेकिन उनके भीतर एक पूरा निर्णय छुपा था।
वह साइकिल पर बैठा और चला गया, जैसे कोई फैसला सुनाकर न्यायालय खाली कर दिया हो।
रामनारायण वहीं खड़ा रह गया।
उसके हाथ में नोट था, हल्का, लेकिन उस पल उसे भारी लग रहा था। वह कुछ समझ नहीं पा रहा था, या शायद समझना नहीं चाहता था।
वो धीरे से भद्दी सी गाली देकर बड़बड़ाया—
“साला… दस रुपए में मज़े ले गया…”
लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पहले जैसी ठसक नहीं थी। उसमें एक हल्की-सी झिझक थी, जैसे भीतर कहीं कोई सवाल उठकर फिर दब गया हो। नाला वैसे ही बह रहा था। गली में धूल अब भी थी। लेकिन उस दिन, उस छोटी-सी झोंपड़ी में, भूख और इंसानियत का जो सामना हुआ था, उसकी गूँज बहुत दूर तक जाने वाली थी।
किसी के भीतर जागेगी…
किसी के भीतर सो जाएगी।

शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’

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