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धर्मान्धता भी अधर्म ” – विनोद कुमार शर्मा

माना कि धर्म की जड़ पाताल में होती अर्थात बहुत गहरी होती मानव जीवन में उसके अवतरित होने से पहले उसके माता-पिता का धर्म के रूप में विरासत में वही धर्म मिलता जिसे जीवन पर्यंत वह निभाता धर्म श्रद्धा भाव दर्शन और कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति के रूप में निरन्तर सामने आता धर्म की प्रासंगिकता पल पल मानव जीवन को प्रभावित करती
भारतीय संस्कृति में धर्म सर्वोपरि एक दिव्य अलौकिक अहसास और संस्कारों की डोर से जुड़ा माध्यम लेकिन धर्म में कट्टरता और धर्मान्धता उसके दोषों के रूप में सामने आती और अधर्म की राह पर ढकेलती धर्म की अनगिनत शाखाएं जिन में से किसी एक को लेकर चलें तो अभीष्ट फल मोक्ष की प्राप्ति सम्भव वेद पुराण शास्त्र ग्रंथ और धार्मिक साहित्य जप ताप पूजा पाठ तपस्या निर्गुण सगुण भक्ति मार्ग आस्था को मजबूती देता भारतीय दर्शन में कोटि कोटि देवी देवताओं को युगों युगों में प्रभु अवतारों ऋषि मुनियों किन्नर गंधर्व प्रकृति पालक पांच तत्वों को दैवीय शक्तियों को धार्मिक अनुष्ठान और भक्ति मार्गों का अद्भुत भाव और स्वरूप प्रत्यक्ष नजर आता l
जीवन मत्यु का अटल सत्य मोक्ष और नर्क द्वार की अवधारणा कर्मों की प्रधानतानुसार आत्मा योनियों में शरीर के रूप में जीवन चक्र पूरा करती धर्म के ज्ञान की कमियों से अज्ञानता का उदय होता जो स्वार्थ लोलुपता आलस्य अहम से विवेक क्षीण कर देता धर्म की आड़ में अधर्म राक्षसी प्रवृत्ति की ओर तेजी से अग्रसर होता जब धर्म की व्याख्या स्वार्थ प्रेरित होकर धर्मांध बना देती तो नासिक के अधर्मी खरात जैसे भेड़ की खाल में भेड़िए अपना वर्चस्व बढ़ाते लेकिन अधर्म का घड़ा फूटता आशाराम लम्बी फेहरिस्त जैसे अधर्मी राक्षस कानून के शिकंजे में जकड़े जाते l
विनोद कुमार शर्मा

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